ध्यान का अर्थ है मनुष्य का उसके अपने विचारों पर स्वयं का नियंत्रण अर्थात उसके विचार उसकी इच्छा के भाव के अनुसार उत्पन्न हो । उसकी इच्छा के अनुसार उत्पन्न नाम इसके लिए मनुष्य उन्हें तरह-तरह की पद्धतियां विकसित की हैं । लेकिन सही पद्धति पर किसी का ध्यान नहीं गया है । ज्यादातर सभी का ध्यान मस्तिष्क को विश्राम देने की एक्सरसाइज समाधि पर गया है ।
ध्यान की तीन स्थितियां हैं नंबर 1 अति सक्रिय परम ऊर्जा में विचार श्रृंखला का इच्छा अनुसार उत्पन्न होना ह ,नं०2 दूसरी स्थिति में विचार श्रृंखला सकारात्मक पर हो या नकारात्मक विचार हो लंबे समय तक चलती रहती है । जिससे मनुष्य लगा का क्रमबद्ध रूप से देर तक सही सही बोलता रहता है देर तक सही सही कार्य करता रहता है। नं० 3 तीसरी स्थिति में जब मस्तिष्क लगातार चिंतन मनन करने से थक जाता है ऐसी स्थिति में ऊर्जा की कमी से मस्तिष्क विचार हीनता , विचार शून्यता या विनता (वैचारिक विचार हीनता ) की स्थिति में चला जाता है । जिसे समाधि कहते हैं जो लोग समझदार बुद्धिमान होते हैं वह अपने दिमाग पर अपना नियंत्रण करना सीख लेते हैं । ज्ञानी ध्यानी कहा जाता है ऐसे ज्ञानी ध्यानी लोग ही अपने जीवन में तरक्की करते हैं ।
जो लोग अपने विचारों पर अपने मन मस्तिष्क पर नियंत्रण करना नहीं सीख पाते या जिनके मस्तिष्क के नियंत्रण केंद्र को विचार नियंत्रण प्रक्रिया को दूसरे लोग अपनी बातों से गलत ज्ञान देकर , गलत मानसिक एक्सरसाइज करा कर खराब कर देते हैं तो ऐसे ध्यान खराब लोग मनुष्य मूर्ख कहे जाते हैं । शिलक कहे जाते हैं । जो आजीवन हानि उठाते रहते हैं ।कभी यह अपने विचारों के दुष्प्रभाव से बचने के धार्मिक स्थलों पर जाते हैं । कभी ज्योतिष सलाहकारों के पास जाते हैं । इनकी समस्याएं हैं कि सुरसा के मुंह की तरह खुली रहती है । क्योंकि इन्होंने ध्यान करना अपने मस्तिष्क पर अपना नियंत्रण अपने आप करने की विधा मस्तिष्क की कार्य क्रिया प्रणाली सीखी ही नहीं , मन के बारे में , मस्तिष्क की बनावट के बारे में कुछ पढ़ा नहीं , सुना नहीं , जाना नहीं । परिणाम यह होता है यह अपने मस्तिष्क में दूसरों के विचार अपनी बिना मर्जी के डलवा कर अपने ध्यान केंद्र को अपने हाथ से अपने आप खुद खराब करवा लेते हैं ।। मनुष्य में विचारों पर नियंत्रण करना उसके मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिका न्यूरॉन के अंदर डैन्ड्राईट में भरे हुए निसिल कण /ग्रेन्यूल्स की सेटिंग पर निर्भर करता है। इस न्यूरॉन डेंड्राइड की उर्जा के अनुसार सभी लोगों का मस्तिष्क अपनी-अपनी न्यूरॉन ऊर्जा के अनुसार अपने अपने तरीके से कार्य करता है एक न्यूरोगैलियल सैल न्यूरान में 50000 से लेकर 200000 तक ऊर्जा स्रोत माइट्रोकांड्रिया होते हैं जिनके आधार पर मनुष्यों की मानसिक कार्य क्षमता बुद्धिमता अलग-अलग होती है।
न्इयूरांन के निसिल ग्रेन्यूल्स और न्यूरॉन की माईट्रोकोन्ड्रिया संरचना संख्या दूसरे लोगों के विचारों से बिगड़ जाने के कारण लोगों पर तरह-तरह की ज्योतिष महादशा ए चल जाती हैं जैसे सूर्य महादशा चलने पर मनुष्य उग्र विचार हो जाने से मधुमेह जैसे रोगों में फंस जाता है । चंद्र दशा चल जाने पर मनुष्य अति चंचलता से किसी काम को पूरा नहीं करता सारे काम बीच में आधे अधूरे छोड़ने लगता है । मंगल दशा चल जाने से वह अकारण दूसरों से लड़ने झगड़ने लगता है । गुरु दशा चल जाने से वह ज्ञान विरुद्ध ज्ञान विपरीत हो जाता है । शुक्र दशा चल जाने सेअति भोगों आसक्ति से वह विरुद्ध लड़ाई झगड़ों में फंस जाता है । सनीचर महादशा होने पर मस्तिष्क के अत्यंत निष्क्रिय हो जाने जड़ हो जाने की स्थिति में वह मंद मस्तिष्क कार्य करने की मनोवैज्ञानिक क्रिया पद्धति में आकर अपने सारे काम बिगड़ने लगता है , आलसी निकम्मा सुस्त रहने लगता है । इंद्र की महादशा पड़ने पर वह सक्रिय होने के स्थान पर सबसे लड़ने झगड़ने लगता है । राहु की महादशा पड़ने पर वह व्यर्थ की कल्पनाएं करते हुए अपनी मानसिक ऊर्जा को बेकार की बातों में खराब करता रहता है । केतु की महादशा पड़ने पर वह विश्राम नहीं कर पाता , मन मस्तिष्क शरीर को विश्राम नहीं दे पाता है। इस प्रकार उसके समस्त क्रियाकलाप ज्योतिषियों ने अपने अपने हिसाब से शब्द देखकर गलत व्यवहार सूचक या सही व्यवहार सूचक शब्द दिशादशा महादशा को बनाया है।। ज्योतिष की यह दशा महादशा आदि मस्तिष्क के अंदर न्यूरॉन के निसिलग्रेन्यूल के जम जाने पर या एक जाम सेटिंग होने पर बन जाती है यह मस्तिष्क की जाम सेटिंग उसके मस्तिष्क के निचले स्तर चित्त नियंत्रक अवचेतन मन से नियंत्रित होती है । दूसरों के द्वारा मिले गलत विचारों के प्रभाव से भय की अधिकता इस जामरीन ब्रेन सेटिंग को और बुरी तरह से बिगाड़ कर रख देती है ।
जब तक दिमाग की जामरीन सेटिंग होती है तब तक मनुष्य का मस्तिष्क ठीक से काम नहीं कर पाता है इस जामरीन सेटिंग को ठीक करने के लिए अक्सर मनुष्यों को तरह-तरह के मंत्र पूजा पद्धति बताई जाती हैं । तरह-तरह के मनोवैज्ञानिक विचार बताए जाते हैं । जो लोग जिस समय ध्यान कर रहे होते हैं तो उस समय सबसे पहले मन के अंदर भरे भाई विचार तरह-तरह से भयंकर जीवो के रूप में निकलते हैं जिससे मनुष्य बुरी तरह ध्यान के दौरान उत्पन्न दिवास्वप्नों से डर जाते हैं ।जब यह विचार पूरी तरह से निकल जाते हैं और मनुष्य को यह विवेक हो जाता है कि यह सब उस मनुष्य के अपने मन में भरे हुए डर से उत्पन्न बुरे विचारों का प्रभाव था । यह कुछ बुरे विचार जब दिमाग से पूरी तरह से निकल जाते हैं उसके बाद कुछ बुरे नकारात्मक — ve विचारों के मस्तिष्क में से खाली हो जाने पर मस्तिष्क कुछ क्षणिक समय के लिए विचार शून्य विश्राम अवस्था में आ जाता है ।तब उस मस्तिष्क की विश्राम अवस्था में प्रज्ञावान /समझदार /बुद्धि मान लोग मन /चित्त के पुनः सक्रिय होने से पहले उसके मन के अंदर अवचेतन मन स्तर पर उत्तम कथन करके श्रेष्ठ विचार उसके अंतर्मन नियंत्रण केन्द्र डायनसैफलान के आत्मा / प्राण निवास हाईपोथैलामस में उच्च ध्यान अवस्था तुर्यातीत अवस्था में उचित संम्मोहन प्रयास द्वारा किसी भी उचित ध्यान पद्धति ( भाव अतीत ध्यान , प्रेक्षा ध्यान , विपश्यना ध्यान , सोहम ध्यान ,रजनीश ध्यान विधा ) द्वारा उत्तम कथन करके उत्तम विचार डाले जाते हैं । तो जैसे-जैसे मन के अंदर सकारात्मकता युक्त + ve उत्तम विचार जाते रहते हैं मस्तिष्क के बुरे विचार बाहर निकलते रहते हैं । जब मस्तिष्क के अंदर अच्छे उत्तम विचार अधिक मात्रा में आ जाते हैं तो उसके बाद मस्तिष्क निर्भय अवस्था में आ जाता है , और अपना काम सही रूप से करने लगता है । जिससे मनुष्य का व्यवहार कार्य क्रियाकलाप अपने आप ठीक होने लगते हैं । इसलिए जो बिना गुरु के शिष्य ध्यान करते हैं । किताबों में पढ़ कर तरह-तरह की ध्यान पद्धतियों से तो बिना गुरु के ध्यान करने से भय निकलने की परिस्थिति में वह डर जाते हैं ।कोई कोई तो डर की अधिकता के प्रभाव से भयंकर डिप्रेशन / मानसिक अवसाद में चले जाते हैं। कोई इसे भूत प्रेत पिशाच का उत्पात समझ कर ध्यान को छोड़कर ध्यान स्थान पर से बुरी तरह से डर कर भाग जाते हैं ।
इसी को कहा जाता है कि ध्यान के दौरान मन उचाट क्यों होता है ? इसीलिए कहा गया है कि यदि गुरु अच्छा है ज्ञान अच्छा है तो ध्यान भी अच्छा होगा और अगर अच्छा ध्यान है तो मन की आंतरिक संरचना भी बदलेगी लेकिन कुछ समय लगता है उसी के अनुसार मन की आंतरिक संरचना बदलती है उस लगे समय को ही शास्त्रों में महादशा या दशा कहा गया है जिसके दौरान मनुष्य का मन अपने मस्तिष्क की अपने निजी न्यूरॉन संरचना न्यूरोगैलियल कोशिकाओं को बदलने का प्रयास कर रहा होता है।
उत्तम कथा सत्संग से ग्रहण उत्तम विचार मन में आने पर मन में निर्भय भाव आता है जब मन निर्भय बहाव में आ जाता है तो यह शरीर का ध्यान पूर्ण रूप से रखने लगता है जिससे मन के स्वस्थ होने पर तन अपने आप स्वस्थ हो जाता है तथा मन के अस्वस्थ होते ही कुछ समय पश्चात तन भी बीमार होने लगता है रहने लगता है अतः ध्यान या शब्द ग्रहण पर विशेष ध्यान रखा जाए अप्रिय शब्द संभाषण से बचा जाए इससे अपना मन मस्तिष्क ठीक रहेगा अर्थात व्हाट्सएप फेसबुक टीवी न्यूज़ चैनल देखते समय दिमाग को सक्रिय रखा जाए निष्क्रिय नहीं निष्क्रिय होते ही नकारात्मक विचार दिमाग में टीवी द्वारा व्हाट्सएप द्वारा फेसबुक द्वारा दूसरे लोगों के मन का कूड़ा डाल दिया जाता है ऐसे में अपने मन को स्वच्छ रखना बहुत जरूरी है और मन की सफाई के लिए ध्यान करना बहुत जरूरी है।
ध्यान की दीर्घकालीन विश्राम अवस्था विचारहीनता अवस्था बने रहने पर अक्सर ब्रह्मांड में घूम रही अशरीरी आत्मा आत्माएं उस विश्राम मस्तिष्कध्यानी , बेमन मनुष्य को अपने नियंत्रण में लेकर उससे तरह तरह के कार्य कराती हैं इसलिए ध्यान में निष्क्रिय अवस्था में अधिक समय तक तल्लीन रहना अपने लिए खतरनाक हो सकता है । हां ध्यान की सक्रिय अवस्था अवश्य ही अपने लिए सबके लिए हितकारी होती है ।
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