मैं हमेशा दुखी रहती हूँ. ऐसा नहीं है कि मैं खुश रहने की कोशिश नहीं करती, पर मेरे आसपास वालों के व्यवहार के कारण मन दुखी हो जाता है. मुझे क्या करना चाहिए?


मनुष्य के सुखी रहने और दुखी रहने का कारण उसको मिली आधी अधूरी गलत शिक्षा है जो चार मुख्य पैर /या चरण या वाद पर निर्भर है नंबर 1 आदर्शवाद -: इसके अनुसार संसार में केवल निर्माण कार्य ही उत्तम है विनाश कार्य अधम है यदि निर्माण हो रहा है मन की इच्छा अनुसार तो श्रेष्ठ है और विनाश हो रहा है मन की इच्छा अनुसार को भी श्रेष्ठ है ॥ परंतु यदि निर्माण विनाश दोनों ही कार्य मन की इच्छा अनुसार नहीं होते हैं तो मन को दुख होता ह । एक नंबर दिमाग की कंडीशन ।। नंबर 2 पर आती है प्रकृतिवाद की शिक्षा :- के अनुसार समाज में सृष्टि में जीवों का जीवन हिंसा अहिंसा चक्र से सृष्टि में संचालित है , लेकिन हिंसा अहिंसा से उत्पन्न फल की प्राप्ति जीव के निजी बुद्धि कौशल स्मृति से संचालित ह । ऐसे में प्रकृति से यदि जीव को बिना कर्म किए उत्तम फल प्राप्त हो जाए तो सर्वोत्म और कर्म करने उत्तम फल प्राप्त हो जाए तो उचित है । सोचने मात्र से कल्पना करने पर या स्वप्न में भी या कर्म करने पर भी फल प्राप्त ना हो तो मन को दुख होता है ।। नंबर 3 यथार्थवादी शिक्षा :- इस शिक्षा के अनुसार सृष्टि के सभी जी यथार्थ से बचते हैं यथार्थ दर्शन होने पर सभी को शारीरिक मानसिक हिंसा दुख प्राप्त होता है इस यथार्थवाद से बचने के लिए सभी जीव स्वयं भ्रम में रहते हैं , और दूसरे जीवो को भ्रमित करते हुए अपना जीवन जीते हैं ।। ऐसे में जो ज्ञानी तत्वदर्शी पुरुष है जिन्हें विवेक उत्पन्न हो गया है सिर्फ वही यथार्थ को सहन कर पाते हैं और यथार्थ को देख पाते हैं सुन पाते हैं समझ पाते हैं । जिनको सत्य दर्शन / विवेक बोध नहीं हुआ है वह ज्ञान के यथार्थ ता के अभाव में विवेक बुद्धि न होने पर यथार्थ को सहन नहीं कर पाते हैं जिससे वह अति दुखी होंगे ।। 4 प्रयोजनवाद शिक्षा :— इस शिक्षा के अनुसार सभी जीव लालच बस अपनी अपनी इच्छा पूर्ति करते हुए इस सृष्टि समाज में घूम रहे जिनकी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं तरीका नैतिक हो या अनैतिक खुशी और सुख पूर्वक जीते हैं परंतु जिन लोगों के इच्छाएं प्रयोजन करते रहने पर भी लालच काम क्रोध मद लोग विधि अपनाने पर भी पूरी नहीं होती हैं वह अपनी असमर्थ बुद्धि को दोष ना देते हुए दूसरे लोगों को दोष देते हुए दुखी होकर अपना जीवन जीते हैं ।।

यहां से शुरू होती है ।।

आपकी समस्या का कारण है —कि आप अपने जीवन को अपनी शर्तों अपने मानदंडों के अनुसार जीना चाहती हैं आपके विचार के अनुसार सृष्टि के समस्त जीव पशु आपके जीवन को जीने में आपकी बाधा बने हुए हैं। क्योंकि आपके मन मस्तिष्क की बनावट की कंडीशनिंग आपके माता पिता ने कुछ इस प्रकार की है । एकपक्षीय दर्शन या देखना , दूसरे पक्ष को ना देखना या दूसरे पक्ष की अवहेलना करना,, यह समस्या अक्सर उन लोगों के साथ आती है जो समाज से प्रकृति से दूर रहते हुए सिर्फ अपने परिवार में अपने परिवार तक आदर्शवादी शिक्षा की परिकल्पना के अनुसार अपना जीवन जीने की कोशिश करते हैं । और वह दूसरों से भी यह आशा करते हैं कि सभी जीव अपने जीवन को उनके द्वारा बनाए आदर्श वाद के अनुसार जिएं है । जिससे किसी को कोई दुख कलेश समस्या पैदा ना हो ।।

परंतु यह परिकल्पना मात्र स्वयं/अपने आप तक सीमित रहे तो अच्छा है परंतु जब यह परिकल्पना समाज की ओर चलती है । तो हम भूल जाते हैं कि समाज में हमारे अलावा अन्य लोग ऐसे भी हैं जो प्रकृति वादी , प्रयोजनवादी शिक्षा के द्वारा शिक्षित दीक्षित हुए हैं । जिनकी नजरों में अहिंसा से ज्यादा हिंसा , सच्चाई से ज्यादा बुराई ,,के अलावा अन्य खतरनाक मानदंड भी उनके जीवन में स्थान रखते हैं । ऐसे में हम उन्हें बुरा कहे तो कहे परंतु वह हमारी बुराई की कोई चिंता नहीं करते और अपने जीवन को अपने मानकों के अनुसार जीते हुए हमसे ज्यादा अपने जीवन को अच्छा समझते हैं जैसे हिंसा कर्म धारी कसाई को अपना जीवन हिंसा पर आधारित होने से वह हिंसा अहिंसा में विवेक नहीं समझता ।

आपकी समस्या नजर कम नजरिया पर फोकस करने की है आपका नजरिया प्रोएक्टिव (पूर्वानुमान लगाना ) या रिएक्टिव /प्रतिक्रियावादी हो गया है आप लोगों को लोगों की बातों को पूरी तरह से सुने बिना ही अपनी प्रतिक्रिया देने लग जाती हैं जिससे लोग आपकी बातें सुनना पसंद नहीं करते होंगे इसके लिए आपको रांडा बर्न पुस्तक जादू ,,और फ्लोरेंस लेटर की पुस्तक पर्सनालिटी प्लस ,,को पढ़कर अपनी कमी को खुद ढूंढना है और उसके बाद अपने व्यवहार में परिवर्तन खुद करना है यदि आपके व्यवहार में कमी का पता आपको लग जाए तो आपकी समस्या अपने आप.दूर हो जाएगी ।।

अब जहां तक खुशी की बात है खुशी एक मानसिक सेटिंग है ,, खुशी एक आदत है ।। जो लोगों को सत्य ज्ञान वास्तविक स्थिति का बोध हो जाने पर अपने आप आ जाती है इसके लिए आपको निजी गूढ़ चिंतन या अपनी अमूर्त चिंतन पद्धति में स्वं सुधार करने की आवश्यकता है । अधिकतर लोग अपनी समस्या के समाधान के लिए दूसरों से अनेक समस्या हल विकल्प मांगते हैं ।उन्हें अपनी जिंदगी में शामिल करते हैं नतीजा समस्या और बिगड़ जाती है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की समस्या का कारण अलग अलग होता है ऐसे में अपनी समस्या को खुद पहचानिए समझिए और सही कारण मिलने पर अपनी समस्या का समाधान स्वयं सोचिए , और यदि समस्या समाधान नहीं हो सकता है बलवान शत्रु से पंगा ले लिया है तो समस्या को सहन करने की आदत डालिए ।

लेकिन यह बात याद रखने की है कि खुशी एक मानसिक स्थिति है एक मानसिक विचार है एक आदत है एक नजरिया है एक प्रतिक्रिया है - जो सीखने पर स्वभाव से अपनी मानसिक संरचना में अपने आप परिवर्तन कर लेने पर आती है ।

वैसे खुशी अनुवांशिक गुण भी है पारिवारिक गुण भी है जो माता-पिता से उनके बच्चों में आता है इसी प्रकार से दुखी रहना एक अनुवांशिक गुण है परिवारिक गुण है जो माता-पिता से उनके बच्चों में उनके व्यवहार को अपना लेने से आ जाता है ऐसे में जरूरत है खुश रहने के लिए अपने दिमाग की सेटिंग अपने आप कीजिए अपनी समस्या का हल खुद सोचिए और सत्य ज्ञान प्राप्त होने पर संतुष्ट होना सीखिए क्योंकि मनुष्य का सोचने पर अधिकार है परिस्थितियों पर परिवर्तन नियंत्रण करने का अधिकार मनुष्यता नहीं मानव समाजऔर पशु समाजसृष्टि का होता है ऐसे में खुशी रहना सीखिए ।।

किसी भी मनुष्य का खुशी रहता उसके यथार्थवादी शिक्षा द्वारा स्थापित सत्य अहिंसा के मानदंडों का आदर्शवादी शिक्षा के सत्य अहिंसा के मानदंडों के आधार पर सम्यक श्रेष्ठ कब माना जाता है जब उसमें विवेक या परिस्थिति के उत्पन्न होने की कला और परिस्थिति से आगे भविष्य में परिवर्तन की कला विज्ञान की समझ प्रज्ञा उत्पन्न हो जाती है ।

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