, हिंदुओं में 3 श्रेष्ठशब्दों जैसा ना उड़ाया है ब्रह्मा इंद्र और अवतार यह 3 शब्द जो समाज में सर्वोच्च शिरोमणि शिखर पुरुषों के लिए उपयोग में पहले लाए जाते थे । आज वही तीन शब्द ब्रह्म ज्ञान अज्ञान के कारण पतन पतित पत्रिका पर्याय बने हैं । इस पर मैं अवतार पर अपने विचार व्यक्त कर रहा हूं अवतार के बारे में रजनीश की प्रसिद्ध पुस्तक संभोग से समाधि की ओर मैं लिखा है की :- अवतार हमेशा राजा क्षत्रिय और अमीर परिवार में ही पैदा होते हैं गरीब परिवार में कभी भी भगवान पैदा नहीं हो सकता ।इस पर रजनीश ने कहा है गरीब एक अकेला अपनी जिंदगी अपना परिवार अपने दम पर जीता है अधिकतर मेहनत करते हुए , गरीब के पास समाज जाल संगठित रूप में नहीं होता जो उसका सही तरीके से प्रचार प्रसार कर के लोगों में उसके ज्ञान धन बल की सही स्थिति व्यक्त कर सकें ।
जबकि अमीर के पास ,क्षत्रिय जाति के पास , राजा के पास बच्चे के जन्म लेने से पहले एक संगठित सामाजिक प्रचारक जाल होता है जिसमें राजा का बेटा यदि अक्षम है मूर्ख है तो वह मूर्ख राजपुत्र अपने संगठन में नियुक्त श्रेष्ठ बुद्धि बलधारी लोगों के बल पर अपने जीवन को सम्मानित होकर पूरा करता है । अर्थात राजा के मूर्ख बेटे को बुद्धि हीनता का अभिशाप नहीं झेलना पड़ता । जबकि गरीब के बेटे को बुद्धि हीनता बहुत मुश्किल से जीवन जीने देती है हम कह सकते हैं निर्धन व्यक्ति बुद्धिहीनता से अपना जीवन रोग और संघर्ष में समय से पहले पूरा करके अकाल मौत मरता है ।जीवन का आनंद नहीं देख पाता । जीवन दर्शन नहीं कर पाता ।। जबकि अमीर का बेटा भी समाज के संगठन जाल माध्यम धन के कारण मूर्ख निर्मल होते हुए भी अपने जीवन को ऐश्वर्या पूर्वक जिया करता है । अमीर के संगठन से प्रभावित होकर लो लोग अपनी बुद्धि का प्रयोग नहीं करते हैं और जो अमीर का प्रचार संगठन जैसा प्रचार करता है उसके प्रचार को सच मानते हुए गरीब और निर्धन लोग आसानी से स्वीकार कर लिया करते हैं । ऐसे में जाहिर है यदि कोई व्यक्ति बल बुद्धि धन समर्थित है वह अपना एक निजी संगठन बनाता है । यह निजी संगठन उसे लोगों में भगवान की तरह प्रचारित प्रसारित किया करता है जिससे लोग इसके नाम से प्रभावित होने के कारण इससे मिलने वाले लाभ के कारण इसे भगवान समझने लगते हैं । ऐसी विचित्र अवधारणा के कारण हिंदुओं में तरह-तरह के अवतार हुए ।। यह अवतार कथाएं कुछ विशेष लोगों ने अपनी सिस्टम मंडली के द्वारा समाज को पढ़ाएं गए थे। हैं ।और अपने को भगवान के रूप में प्रचारित करवाया इस अवतार कथा को आप आज भी विभिन्न गुणों के बने संगठन में जाकर सुन सकते हैं । जैसे सतपाल महाराज के महामानव मिशन में , धन धन सतगुरु के मिशन में , राम रहीम के मिशन में , रामपाल के मिशन में आप जब जाकर उनके अनुयायियों से वार्ता करोगे तो उनके अनुयाई अपने अपने मिशन के शिखर शिरोमणि पुरुष को भगवान बताते हैं , जैसे सतपाल महाराज भगवान हैं । धन धन सतगुरु भगवान है ।राम रहीम भगवान हैं । आचार्य रजनीश भगवान हैं । रामपाल भगवान हैं । कबीर भगवान हैं । साईं बाबा भगवान है ।कहने का तात्पर्य यह है एकमत की फौज के लोगों की संख्या जब चाहे जिस किसी को भगवान बना दे ।।
हिंदुओं में अवतारवाद का सिद्धांत भगवान या विशेष समर्थ पुरुष की उत्पत्ति को लेकर बना है। अवतार पुरुष का बौद्धिक स्तर सामान्य सामाजिक लोगों से अति उच्च होता है उसका शारीरिक ऊर्जा स्तर भी सामान्य लोगों से अति उच्च होता है । इस बात को लेकर कहा गया है महापुरुष और अवतारी पुरुष पढ़ाने लिखाने से नहीं बनते , किसी विशेष कुल में विशेष धर्म रीति प्रक्रिया से नहीं बनते , बल्कि अवतारी पुरुष का उर्जा स्तर यह बताता है कि अवतारी पुरुष के पास सामान्य लोगों की तुलना में अधिक बल बुद्धि होती है जैसे रावण कंस को दुष्टता पढ़ाई लिखाई नहीं गए थे । इन्हें सुधारने का विशेष प्रयास किया गया था परंतु जब इनके आगे समस्त सृष्टि मानव समाज विवश हो गया तब विधाता ने इन्हें नियंत्रित करने को इनसे उच्च स्तर के राम और कृष्ण को भूमंडल पर भेजा था । कल्याण में अवतारवाद को लेकर लिखी गई एक लाइन विशेष है :- विनाश ज्ञान, निर्माण ज्ञान , युक्त विशेष स्त्री पुरुष शिक्षित दीक्षित नहीं किए जाते ॥ वे जन्म के समय ही सामान्य बच्चों से अधिक अलग नजर आते हैं जैसे सीता मंदोदरी द्रौपदी स्त्रियों में पुरुषों में राम कृष्ण पांच पांडव एक जन्म की शिक्षा से नहीं बन सकते अर्थात अवतार प्राकृतिक क्रिया है मानवीय क्रियाएं नहीं है ।। जिन लोगों को पितर विद्या से डीएनए सुधार विधि पता लग जाती है यह भी अपनी इच्छा के अनुसार उत्तम श्रेष्ठ संतान पैदा करने में समर्थ होते हैं उन्हें भी अवतार की श्रेणी में रखा जाता है जैसे ऋषि मार्कंडेय प्रश्न आदि साधारण पुरुष नहीं थे यह इनके माता-पिता द्वारा प्रयोग में लाई गई पितर विद्या डीएनए विश्लेषण ऊर्जा स्तर का विशेष ज्ञान था ।
अवतार के बारे में व्यक्ति के जीवन के लिए योग के 8 शब्द विशेष स्थान रखते हैं । 1 . यम ,, 2 नियम ''' 3 आसन "" 4 प्राणायाम …. 5 प्रत्याहार # 6 धारणा @ 7 ध्यान & 8 समाधि $ लोगों ने इन 8 शब्दों का अर्थ अपने-अपने अनुसार लगाकर तर्क का कुतर्क और अर्थ का अनर्थ कर दिया है जैसे नंबर 1 यम , यम का अर्थ है नियम हीनता मर्यादा हीनता या आजीवन दूसरे लोगों के आदेश और ज्ञान के अनुसार नाचना गरीब का जीवन यम के आधीन रहता है हमें यम का प्रतीक भैंसा और भैंसे का मालिक किसान को बना दिया जो समाज का अन्नदाता है । उसे नंबर दो नियम या( मर्यादा पालन का सही पूरा ज्ञान नहीं होता ) आसान (स्थिति पक्की पूरी तरह से स्पष्ट नहीं ) प्रत्याहार (अपने आप अपने लिए प्रयत्न करके कर्म करके शर्म रखते हुए अपना आहार व्यवस्था स्वयं करना ) प्राणायाम ( गरीब के शरीर में उसके निजी प्राणों का आयाम प्राणों की स्थिति उसकी अपनी इच्छा ज्ञान के अनुसार नहीं होती उसके प्राण बुद्धिमान को बलवान को धनवान को देखते ही उत्क्रमण करने ऊपर उठने लगते हैं ) धारणा ( गरीबों की अपनी गरीबों की अपनी अपने बारे में दूसरों के बारे में स्पष्ट धारणा नहीं होती उनकी गरीब की धारणा का निर्धारण दूसरे लोग करते हैं ) ध्यान ( गरीब व्यक्ति के दिमाग में आपकी शंका प्रश्न पर उसका अपना जीवन जीने के लिए उसके अपने विचार नहीं होते वह अपने जीवन को दूसरों के विचारों ध्यान के आधार पर जीता है ) समाधि (गरीब के पास सही सही ध्यान धारणा मानसिक मस्तिष्क क्रियाओं की पद्यति का ज्ञान न होने से उसकी बुद्धि सम्यक निष्पक्ष न होकर पक्षपात पूर्ण होती है कारण कि वह अपने को निर्बल असमर्थ कमजोर समझने से सदैव दूसरों के आश्रित होकर अपने जीवन को धन्य सार्थक समझता है उस गरीब को न खुद पर विश्वास होता है न सृष्टि संचालन कर्ता पर विश्वास होता है उस गरीब को उसका शोषण करने वाले उसको धोखा देने वाले उसे भ्रम में मुगालते में रखने वाले सदा सदा के लिए गुलाम / पशुज zसमझने वाले स्वामी /मालिक पर हद से ज्यादा विश्वास /यकीन होता है ।गरीब को अर्ध सत्य का ब्रह्मांड नियम सही तरीके से नहीं आता वह अपने जीवन को पशुज जैविक नियमों के अनुसार जीता है उसे समाधि ज्ञान निष्क्रिय अवस्था मे अधिकतम मानसिक चैतन्यता का अमूर्त चिंतन विधि ज्ञान नहीं होता है।
अब इसके ठीक विपरीत अमीरी के कारण नं० :-१ यम मर्यादा हीनता को अच्छी तरह से जानते हुए अमीर कभी भी मर्यादा हीनता से उत्पन्न परिस्थिति को जानते हुए मर्यादा हीनता से से पंगा नहीं लेता न०२:- नियम अमीर का जीवन सदैव अधिकतम नियम पूर्वक जिया जाता है जिसमें जैविक ऊर्जा का अपक्षयण नहीं होता ।नं०३:- प्रत्याहार अमीर कभी भी अपने लिए परिश्रम करके आहार व्यवस्था नहीं करता वह जानता हैवह सदैव संगठित अवस्था में तरह तरह के संगठित परिश्रम संगठन उद्योग निर्रमांणी फैक्ट्री से अधिकतम प्राप्ति होती है जबकि इकाई में अकेले परिश्रम करने पर अन्न धन प्राप्ति न्यूनतम होती है जिससे अमीर संगठन बनाकर फैक्ट्री या उद्योग द्वारा श्रेष्ठ संसाधनों युक्त जीवन जीया करता है जिसे भगव पद प्राप्ती या भगवान के समान जीवन जीना कहते हैं । पृथ्वी संगठन के प्रत्येक उत्पाद के बिक्री विपणन के लिए एक अलग से प्रचार प्रसार इकाई होती है जो समाज में दूसरे लोगों को गुमराह करने भ्रमित करने से लेकर बुद्धिहीन करने तक के विज्ञापन प्रचार प्रसार कार्य किया करती है जिसका भगत जाति से भगवान को विशेष लाभ मिलता है। अमीर व्यक्ति प्राणायाम उत्तम स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देता है ।धारणाएं:- अमीर व्यक्ति या भगवान धारणा अमीर व्यक्ति हमेशा कुछ अलग विशेष धारणाएं रखते हैं जिसमें परोपकार दूसरों के लाभ के द्वारा धन अर्जन करना अमीर लोगों की विशेष धारणा होती है यही विशेषता भगवान में भी पाई जाती है वह भी परहित परिसीमा परोपकार पर आधारित कार्यों को वरीयता देते हैं । ध्यान:- मस्तिष्क द्वारा विचार क्रियान्वयन प्रक्रिया पर विशेष ध्यान देता है उसके विचार उसके अपने हित के अनुसार निजी विचार होते हैं वह सामाजिक विचारों को अपने जीवन में ज्यादा जगह नहीं देता मेरे विचार के अनुसार भगवान पैदा नहीं होता बल्कि जिन लोगों को इन 8 विशेष नियमों का ज्ञान हो जाता है वह समाज में पैदा साधारण व्यक्ति की तरह होते हैं लेकिन अपनी कुछ विशेषताओं की प्रभाव से समाज का सबसे बड़ा संगठित नेटवर्क संस्कृति सभ्यता का निर्माण करते हैं और आप सभ्यता संस्कृति के शिखर शिरोमणि पुरुष पद पर संचालक होते हुए अपनी सभ्यता के प्रचार प्रसार में लगते हुए अपने मंतव्य को आगे बढ़ाते हैं और दूसरी सभ्यताओं संस्कृतियों को धीरे धीरे नष्ट करते हुए सहित करते हुए आगे बढ़ते जाते हैं ।
भगवान बनना भी एक व्यवसाय है एक कला एक विज्ञान है जिसमें विज्ञापन की अहम भूमिका होती है । जिसकी उपलब्धि साधारण मनुष्य से अलग है ।। यह जैविक संरचना में परिवर्तन सामाजिक संरचना में परिवर्तन करने पर आती है अर्थात मनुष्य से भगवान बनने का डीएनए 8 या 10 पीढ़ी में जाकर अपनी कार्यशील योजना में आता है । ब्रह्म ज्ञान विद्या के द्वारा मनुष्य से मनुष्य भगवान का डीएनए बनाया जा सकता है।
हिंदू संस्कृति में सतयुग से लेकर कलयुग तक भगवान के 24 अवतार माने गए हैं जिनमें से 10 प्रमुख अवतार हो चुके हैं । एक मत्स्य अवतार मछली के रूप में :- मनूमहामानव के द्वारा सृष्टि को बचाया गया यह कथा बाईबिल में, कुरान में , हिंदुओं में पुराण में दर्ज है । दो कूर्म अवतार कछुए के रूप :- असुर जब भूमि पर अपनी ईच्छा के अनुसार सृष्टि निर्माण करने की निंयत से भूमि को समुद्र में डुबाने का प्रयत्न किया था तब असुर को अपनी शक्ति का ज्ञान कराने के लिए विष्णु ने विशाल कूर्म बन कर भूमि को समुद्र में असुर का प्रयास निषफल कर दिया था । तीन वाराहा अवतार सूअर के रूप में :- यह कथा हिरण्याक्ष असुर प्रहलाद के पिता के बड़े भाई थे जब समस्त भूमि को है हिरण्याक्ष ने जल में डुबो दिया था तब विष्णु भगवान सूअर का रूप धर कर जल के नीचे गए और पृथ्वी को बाहर निकाला था । आज भी शूकर क्षेत्र ग्राम सोरों जन्म भूमि तुलसीदास घर के पास में विष्णु भगवान का वाराह रूपमंदिर प्रतिष्ठित है जिसके अनुसार जब कभी गंगा क्षेत्र में जल प्रलय हुई थी तब वाराह भगवान ने जल प्रवाह को नियंत्रित करके जल प्रलय से जनमानस की सुरक्षा की थी जंगली सूअर के अंदर यह विशेषता होती है कि वह भूमि के अंदर छेद करके गुफा बनाकर भूमि के अंदर रहता है । आज भी जल बाढ़ प्रलय की समय जंगली सूअर की बलि उन आदि क्षेत्रों में दी जाती है कि यह सूअर मर कर हमें बाढ़ से मुक्ति दिलाएगा ।4 नरसिंह अवतार :- प्रहलाद के पिता हिरण्यकशिपु को विष्णु ने विचित्र शरीर नरसिंह रुप धारण कर भूमंडल को असुर आतंकवाद से बचाया था ।पांच वामन अवतार बौना ब्राह्मण के रुप में प्रहलाद के पौत्र बलि के शासन में राजा बलि का स्थान परिवर्तन पाताल लोक अमेरिका पहुंचाया था भारत भूमि की असुर संस्कृति से सुरक्षा की थी । परशुराम अवतार श्रेष्ठ ब्राह्मण योद्धा के रूप में समाज को आतताई क्षत्रियों के आतंक से मुक्त कराया था ।7 मर्यादा पुरुषोत्तम राम अवतार :- मर्यादा हीन असुर ब्राह्मण रावण को मारकर समाज में सामाजिक मर्यादाओं की प्रतिष्ठा लोकतांत्रिक आधार पर की थी । आठ श्री कृष्ण अवतार 16 कलाओं के पूर्व अवतार रूप में :- मनुष्य को अपने विवेक सर्वोपरि सर्वश्रेष्ठ मानते हुए समाज के गलत हानिकारक घातक नियमों को न मानते हुए अपने लिए अपने परिवार के लिए , भविष्य में समस्त मानव जाति समाज की श्रेष्ठता को ध्यान में रखते हुए नये नियम बनाने की परंपराओं की शुरुआत की थी । 9 बुद्ध अवतार :- मानव जाति के लिए भविष्य में क्षमाशील शांति के गुण श्रेष्ठ सिद्ध होंगे और आधिकारिक जीवन जीने के पुराने पशुध नियम गलत सिद्ध होंगे इसकी आधारशिला गौतम बुध के रूप में प्रस्तुत की थी ।10 कलिक अवतार :- समय परिवर्तनशील है परंतु मनुष्य है अपना जीवन पुराने समय में बने नियमों के अनुसार जीत रहने से अक्सर क्लेषित या दुखी रहता है मनुष्य को दुख से बचने के लिए ब्रह्म ज्ञान की अनिवार्यता , समय परिवर्तन का ज्ञान , और समय के परिवर्तन होते हुए समाज में परिवर्तन का ज्ञान और इन सबके अलावा अपने मन मस्तिष्क से अपनी जीवन जीने की पद्धति में सहायक अपनी बुद्धि में उत्परिवर्तन करते हुए मनुष्य का परिवर्तन की बारिक समझ के अनुसार जीवन यापन करते हुए कृष्ण बुद्धि से मर्यादा उल्लंघन होने पर भी दुखी ना होने से जीवन को प्रसन्न होकर जीवन जीने का ज्ञान का संदेश काल्पनिक ब्रह्म छत्रिय( ब्राह्मण योद्धा) पुरुष कलिक( कल इक भगवान आयेगा) परन्तु कल नहीं आयेगा ऐसे काल्पनिक भगवान के रूप में प्रज्ञा जनों ने कल्इक भगवान अपने कल्पना से बनाया है । यह सृष्टि परिवर्तन के लिए कलयुग में होना शेष है ।।
पितर विद्या या आनुवंशिकी विज्ञान के अनुसार किसी एक श्रेष्ठ गुण के विकास के निरंतर 8 या 10 पीढ़ी चलते रहने पर अंत में मनुष्य विशेष उत्कृष्ट समाज मानव कृति होता है जिसे समाज श्रेष्ठता के आधार पर अवतार मान लिया करता है । । जैसे अवतार कथा पड़ने पर एक विशेष लाइन अंत में मिलती है अवतार धारी के माता पिता ने कुछ ऐसे विशेष पुण्य कार्य किए थे जिनसे उनके घर जन्म लेने को भगवान को आना पड़ा अब इसमें जो विशेष पुण्य कार्य है यह अनुवांशिकी का हेरिडिटी का डी एन ए ( इंक्रीजिंग ) वृद्धि ( डिक्रीजिंग ) घटा ज्ञान है जिस में वांछित गुण वाले डीएनए की निरंतर वृद्धि से 10 पीढ़ी पश्चात कुल में श्रेष्ठ जी मानव पशु पैदा होता है जो समाज से परिवार से अलग विशेष कृति होता है जिसे श्रेष्ठता के गुण के कारण अवतार कहा जाता है ॥
उस मनुष्य के गुण जिस ऐतिहासिक मनुष्य से ज्यादा मिलते हैं उसकी तुलना उसी इतिहास पुरुष से करने पर उसे पुराने इतिहास पुरुष का अवतार या अवतारी अंश कहा जाता है । वैसे अवतार जैसी धारणा का महत्व —पहले था जब लोगों में निजी सोच विकसित नहीं हुई थी सबकी सोच सामाजिक राजनीतिक प्रेरित थी वर्तमान परिपेक्ष में निजी सोच विकसित हो जाने पर अब अवतार जैसी धारणा निर्मूल साबित हो चुकी है । उस अवतार पुरुष को वह श्रेष्ठ पुरुष माना जाता है जो अपनी मानसिक ऊर्जा शारीरिक ऊर्जा का अधिकतम सदुपयोग समाज के हित में करता है ।।
इस धारणा के अनुसार इस भूमंडल पर एक विशेष व्यक्ति का नियंत्रण होने पर उस नियंत्रण करता पुरुष को इंद्र कहा जाता है इस प्रकार से इस धरती पर इंद्र पुरुष का प्रभाव वार्षिक मनु पुरुष का प्रभाव पंचवार्षिक युगपुरुष का प्रभाव 50 वर्षीय होता है 50 वर्ष पश्चात लोगों की सोच बदल जाने पर अवतारवाद के विश्लेषण करके अवतारों को गलत बताया जाता है उनमें कमी ढूंढी जाती हैं और अवतारी पुरुष को साधारण लोगों के समान सिद्ध कर दिया जाता है ।।
यह अवतार की कथा बायोलॉजी के जैव विकास नियम के अनुसार बुद्ध जीवो ने बनाई है जो जीव विज्ञान के क्लासिफिकेशन के अनुसार मछली से शुरू होकर कलिक पर आकर रुकेगी इसमें वर्तमान में मानव जीवन के परिपेक्ष को देखते हुए बुद्ध अवतार को श्रेष्ठ माना गया है। जैव विकास के अनुसार जीवन सरलतम से जतिन जटिल कम की ओर विकसित होता हुआ चलता है।
सृष्टि में शासन करने को , अधिकतम निर्माण विनाश करम करने में मनुष्य समर्थ है श्रेष्ठ है ,पशु इसके लिए उपयुक्त नहीं है ।
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