कभी भी दुनिया कोरोना के प्रकोप से मुक्त नहीं हो सकती है ।इसके लिए लोगों को कोरोना के साथ जीने की सोच बनानी होगी इसके लिए तरह-तरह के विकसित इम्यूनिटी कंसेप्ट का सहारा लेना होगा । कुछ दिन बाद यह वायरस मनुष्य की देह में रम जाएगा क्योंकि वायरस भी सृष्टि में पहला एक छोटा सा सूक्ष्म जीव है इसकी भी इच्छा जीवन जीने की होती है यह भी अपना परिवार बढ़ाना चाहता है । इसी सोच के चलते हुए यह ज्यादा से ज्यादा लोगों को संक्रमित करने की कोशिश करता ह इसमें भी अपने लिए इतना जीवन विवेक है कि यदि तूने अपने जीवन स्रोत मनुष्य /होस्ट को मारने की कोशिश की तो तू भी अपने होस्ट /पोषणदाता मनुष्य के मरने के बाद मर जाएगा ।इसी सोच के चलते हुए यह भी अपने जीवन प्रियता के सिद्धांत से अपने शरीर में अपनी जैविक जीवन हानि की आशंका को देखते हुए समय-समय पर अपने शरीर में जैविक म्यूटेशन या जैविक उत्परिवर्तन करता रहता है । यह लोगों को मारने की कोशिश नहीं करता है लोग इसकी सामान्य संख्या से बहुत अधिक संख्या में बढ़ जाने पर मनुष्य के अपने लिए पोषण कम पड़ जाने पर मनुष्य अपने जीवन संकट समस्या उत्पन्न होने से मरते हैं । जब लोग संक्रमित होकर मरते हैं तो वायरस भी उन मरे हुए लोगों के साथ अकाल मौत मरते हैं ।ऐसे में कभी-कभी कुछ विवेकशील वायरस जो किसी कारणवश उस मृतक मनुष्य से अलग निकल जाते हैं । वायरस की आगे आने वाली भविष्य की पीढ़ियां दूसरे मनुष्यों में संक्रमण करते हुए समय इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं , कि उन से संक्रमित होने वाले मनुष्य संक्रमित हो , लेकिन मरे नहीं ।।
इसी मौलिक सोच को रखते हुए प्रत्येक वायरस जो पहले अपनी घातक मारक खतरनाक संक्रामक सोच के होते हैं वह बाद में विवेक पैदा होने पर अपनी सोच बदल कर मारकता का निजी जैविक गुण तो रखते हैं ।लेकिन घातक मारक होने के गुण धीरे-धीरे छोड़ कर मानव शरीर में सहजीविता का संबंध बनाते हुए चले जाते हैं । स्मूथ वायरस ( नॉनकोटिंग वायरस ) रफ वायरस (हार्डकोडिंग वायरस ) रफ वायरस कुछ समय बाद स्मूथ वायरस में बदल जाते हैं । जो कुछ हमें बाद मानव शरीर में सामान्य रूप से रहने लगते हैं जिनके मानव शरीर में रहते हुए भी मनुष्य नहीं मरते हैं जिसे हार्ड कम्युनिटी कंसेप्ट कहते हैं ।जिससे मनुष्य की कोशिकाओं में अनेक प्रकार के असंख्य वायरस हर समय दबे हुए रूप में रहते हैं ।वह मनुष्य को कोई विशेष हानि नहीं पहुंचाते हैं।
लेकिन जब मनुष्य की आयु पूरी हो जाती है या बुरी तरह से डर जाता है इम्यूनिटी सिस्टम खराब हो जाता है तो वही शरीर में छिपे हुए वायरस बैक्टीरिया सक्रिय होकर मनुष्य को जल्दी से जल्दी मरने में उसकी सहायता करते हैं । जिससे मरने वाले जीव में मरने से पहले मृत्यु गंध पैदा हो जाती है ।लगभग 1 माह पूर्व और उस मृत्यु दंड को भाँँपकर ही दूसरे हिंसक शकुनि जीव बिल्ली गीदड़ उसके मृत्यु गंध प्रभाव से उस मरणासन्न जीव के निकट आने लगते हैं । इसके अलावा कुछ परम संवेदी लोग भी इस मृत्यु गंध को भाप लेते हैं। वह किसी को बता देते हैं और किसी को नहीं बताते हैं ।समाज की सभ्यता के अनुसार ।।
चरक संहिता के विमान प्रकरण में इसका विशेष विवरण है ऐसे में हमें इस वायरस के संग जीने की सोच बनाकर ही जीने में समझदारी है।
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