क्या आर्य समाज हिंदू धर्म से अलग है या फिर हिंदू धर्म की ही एक शाखा है?


दुनिया में दुनिया में अनेक प्रकार के धर्म है । इनमें भारतीय धर्म मैं एक कर्मकांड पद्धति युक्त हिंदू धर्म है जो धनी साधन संपन्न लोगों के लिए उचित है । संसार की सभी धार्मिक जीवन पद्धति है या अधार्मिक जीवन पद्धति है ।सभी तरह की जीवन पद्धतियाँ कर्मकांड धन संपन्नता संप्रभुता पर आधारित हैं ।धार्मिक कर्मकांड आधुनिक सभ्यता व नवीनतम ध धर्म के अनुसार नए धार्मिक कर्मकांड की नई जीवन पद्धति आधुनिक कर्मकांड वाली व्यापारिक प्रतिष्ठित नवीनतम धार्मिक जीवन पद्धति कहा जाता है । जबकि प्राय अधार्मिक जीवन पद्धति में अधिकतम कर्मकांड की आवश्यकता नहीं होती है ।

आर्य समाज के अनुसार आर्य समाज जीवन पद्धति पुरानी ह ।यह प्राचीन सभ्यता संस्कृति धर्म के अनुसार बिना धन के या कम धन के कर्म के अनुसार साधारण तरीके से बिना धर्म के धन के गरीबों के समान जीवन जीने की पद्धति जीवन जीने वाली पुरानी पद्धति है। जिसमें धार्मिक कर्मकांड प्रतिष्ठा के लिए अधिक धन की आवश्यकता नहीं होती । आर्य समाजी जीवन पद्धति के अनुसार समाज का सबसे निचला निर्धनता वर्ग जीवन यापन करें तो श्रेष्ठ है जिससे आर्य समाज कहा जाता है । वह है मूर्ति पूजा के बिना पूजा पाठ करना ।

मूर्ति बनाना उसे वस्त्र आभूषण पहनाना उसका श्रंगार करना और आयोजन के लिए आए हुए सभी श्रेष्ठ मानव जनों को धन देकर विदा करना । आए हुए लोगों का भली-भांति अतिथि सत्कार करना एक महंगा धार्मिक कार्य है। जिसे केवल धनी लोग ही कर सकते हैं । आर्य समाज जीवन पद्धति में ऐसा महंगा धार्मिक पर्व मनाना धन की कमी से वित्तीय संसाधनों की कमी महंगा और सुविधाजनक भारी पड़ता है। आर्यसमाज पुराने समय का , पुराने जमाने का गरीबों का धर्म है । आदिकाल धर्म है। जब लोगों के पास धन नहीं था । सभी निर्धन या न्यूनतम धन वाले लोग वनों में , ग्राम में साधारण तरीके से लोग धार्मिक जीवन जीते थे ।

धार्मिक कर्मकांड और धार्मिक प्रपंच कर्मकांड का धन से सीधा संबंध है । धन हैःः तो धार्मिक कर्मकांड हैं । धन नहीं ःः तो कैसे धार्मिक कर्मकांड ! धनी व्यक्ति ही धार्मिक कर्मकांड के अनुसार अपना जीवन यापन कर सकता है। धनवान धनी व्यक्ति ही धार्मिक कांडों में भाग ले सकता है ।। निर्धन व्यक्ति जिसके पास अपनी दैनिक आवश्यकताओं से अधिक धन नहीं है। तो वह धार्मिक कर्मकांड कैसे करें ? किससे करें ? जिसके पास तरह-तरह के अधिक मात्रा में वस्त्र आभूषण हैं वही व्यक्ति क्षण क्षण में अपना नया वस्त्र परिवेश धारण कर तरह-तरह के अलंकारिक प्रिय रूप में प्रस्तुत हो सकता है परंतु जिसके पास निर्धनता है वस्त्र आभूषण नहीं है पहनने योग्य वस्त्र भी कम हैं वह किस प्रकार से क्षण क्षण में अपना रूप बदलकर दूसरों को प्रिय अप्रिय रुप धारण करके दर्शन दे।ऐसे में अब जब निर्धन व्यक्ति को भी अपना जीवन जीना है तो उसे भी अपना जीवन आखिर किसी ना किसी प्रकार की धार्मिक पद्धति अधार्मिक जीवन पद्धति के अनुकूल अनुसार जीना पड़ेगा ऐसे में निर्धन व्यक्तियों के लिए यह पुरानी बिना कर्मकांड कि आर्य समाजी पद्धति उचित है ।

ईसाई मत में भी ईसा मसीह और मदर मैरी की आभूषण युक्त श्रृंगारिक मूर्ति पूजा होती है । सभी प्राचीन धर्मों में प्राचीन संस्कृतियों में आदिवासी लोग भी अपने अपने तरीके से तरह-तरह की देवी देवताओं की मूर्ति बनाकर मूर्ति पूजा करते हैं । मूर्ति पूजा में तरह-तरह की मूर्तियां बनाकर अपनी आस्था निष्ठा विश्वास संकल्प आवश्यकता के अनुसार फिर उस मूर्ति का श्रृंगार किया जाता है । उसके बाद हवन में रोग और वातावरण के हित को देखते हुए तरह-तरह की औषधियां अग्नि कुंड /हवन स्थली में जाती हैं।

मूर्ति पूजा का महत्व विदुर नीति में लिखा है जिसमें कहा गया है की मूर्ति हीन पूजा करने से संकल्प हीन मनुष्य में आस्था निष्ठा नहीं आती ह जिससे बिना मूर्ति के पूजा पाठ या मूर्ति प्रतिबिंब धारक के कल्प हीन मनुष्य के विचार निर्बल शक्तिहीन होते हैं ।जैसे शिक्षक की उपस्थिति में कक्षा में शिक्षण कार्य प्रभावशाली होता है । क्योंकि शिक्षक एक मूर्ति है ज्ञान दाता की ।। उसी प्रकार से शिक्षक हीन कक्षा में छात्रों के द्वारा स्वतः स्वभावतः किया गया अध्ययन प्रभावशाली नहीं होता है क्योंकि शिक्षक कक्षा में छात्रों को ज्ञान भाव देने के लिए शिक्षक की मूर्ति प्रतिदिन या स्वयं शिक्षक मूल रूप में उपस्थित नहीं होते हैं । इस प्रकार से मूर्तिपूजक संकल्प शील मनुष्य के विचार बलवान होते हैं।

प्रकृति में सभी मनुष्य है या पशु प्राणी जीव मात्र सभी संकल्प के आधार पर बने हैं जिसके जैसे जितने संकल्प होते हैं उन संकल्प के अनुसार यदि उसमें प्राणशक्ति कर्म शक्ति भी है तो वह वैसे ही परिणाम प्राप्त करता है जैसे धन कार्य प्रतिष्ठा पूजा पाठ में काम करना करने वाले मनुष्य को मूर्ति पूजा करते समय हवन आदि में शृंगारिक धनाढ्य स्त्री लक्ष्मी या शृंगारिक धनाढ्य पुरुष कुबेर धनी व्यक्ति की मूर्ति धनी स्त्री की मूर्ति बनाई जाती है । उसका श्रृंगार किया जाता है। फिर पूजा पाठ की जाती है तो दूसरी ओर अनिष्ट कामना से किए गए यज्ञ की पूजा पाठ में दुष्ट पुरुष दुष्ट स्त्री की नंगे बिना वस्त्राभूषण की, विकृत रूप वाली मूर्ति बनाकर उसकी पूजा पाठ की जाती है जिससे मनुष्य के मन में दुष्टता पूर्ण संकल्पा उत्पन्न सके , वह दुष्टता पूर्ण कार्य करके अपने भविष्य को उज्जवल बना सके। प्रकृति में समस्त कर्म आधार का सबसे अच्छा मॉडल मनुष्य माना जाता है यह सर्व समर्थ है I तंत्र की पूजा में विकृत भयंकर रूप वाले पशु जैसे सिंह बाघ सांप बिच्छू ततैया आदि की मूर्ति बनाकर पूजा पाठ किया जाता है।

जिनके विचारों में इतनी शक्ति नहीं बन पाती जितनी बननी चाहिए । उद्देश्य आस्था में संकल्प की स्थापना न होने से या आस्था निष्ठा कम होने से विचार निर्बल संकल्प हीन ही रह जाते हैं जिससे पूजा-पाठ नितेश रह जाती है । पूजा करने वाले साधक और उसके प्रस्तोता दोनों ही पूजा करते हुए विवेक हीन संकल्प हीन विचार हीन पूजा करते समय निष्क्रिय निर्थक कर्म करते समय छुट्टी पर ही रहते हुए बिना दायित्व के छुट्टी के समय पर कर्म करते हैं जिससे मूर्ति हीन पूजा प्रभावहीन रह जाती है। जब की पूजा मूर्ति की उपस्थिति में करने पर यह आस्था निष्ठा संकल्प युक्त होने से और देवी देवता के सानिध्य निकट महसूस होने से विशेष प्रभावशाली हो जाती है । जैसे यदि किसी व्यक्ति का नाम लें तो हमें उसके सानिध्य की अनुभूति ना होने से उसमें आस्था निष्ठा विश्वास कम पैदा होता है। यदि व्यक्ति हमारे सामने प्रत्यक्ष मूर्त रूप में खड़ा हो या उसकी कोई निशानी वस्त्र आभूषण आदि हो फोटो हो उसमें आस्था निष्ठा अधिक होने से संकल्प निकटता होने से उसके प्रति विशेष लगाओ भावना होने से ऐसी में शंकर प्रभावशाली हो जाता है और मनुष्य मनुष्य की मौजूदगी में सहायता ना मिलने पर भी सहायता मिलने की आशा में अपना मनोबल बढ विशेष प्रभावशाली हो जाता है । हमलावर हो जाता है ऊर्जा युक्त हो जाता है संसार में आस्था निष्ठा विश्वास से मिली स्फूर्ति से शरीर में बना स्टैमिना ही समस्त कार्यों का साधन माध्य सेतू है ।

वर्तमान समय के परिपेक्ष में आज भी हम समाज में अमीर और गरीब लोगों को अपने अपने तरीके से विभिन्न धर्म और संप्रदाय में जीवन पूजा पाठ पद्धति से अपना अपना जीवन जीते देखते हैं। आज भी अमीर लोग किसी भी धर्म के हो वह अपने धार्मिक आयोजन में अधिकतम कर्मकांड प्रपंच और धन का खर्च करते हैं। जबकि गरीब लोग अपने धार्मिक कर्मकांड ओ को बहुत साधारण से तरीके में करते हैं और उनके धार्मिक कर्मकांड में धन ज्यादा खर्च नहीं होता है। ऐसे में आर्य समाज को यह कहना कि यह हिंदू धर्म से अलग है यह बिल्कुल गलत है आर्य समाज के तरीके से आज भी हिंदुओं में ही नहीं बल्कि सभी धर्मों के गरीब लोग अपनी अपनी जीवन पद्धति म बिना कर्मकांड के या न्यूनतम कर्मकांड ओं के द्वारा जी रहे हैं अतः मैं यही कहूंगा आर्य समाज / वैदिक धर्म निर्धन गरीब वर्ग ब्राहणद और गरीब श्रमिक लोगों की पुराने तरीके से जीवन जीने की पद्धति ह । जबकि आधुनिक हो या पुराने सभी धनाढ्य और छा क्षत्रप वर्ग के लोग धन संपदा संसाधनों की प्रचुरता के कारण पहले भी धार्मिक कर्मकांड युक्त जीवन यापन करते थे । आज भी वे धर्म कांड कर्मकांड प्रपंच युक्त धार्मिक पर्व धार्मिक पूजा-पाठ धार्मिक उत्सव क का आयोजन करते हैं।

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