क्या ध्यान साधने में कोई खतरा, दुष्प्रभाव है?


बिना किसी अच्छे चरित्र वाले बिना लोभी , लालची , गुरु के निर्देशन में ध्यान साधना करने पर # किताबें पढ़कर ध्यान साधना करनेवाले $ बिना उत्तम गुरु के ध्यान साधना करनेवाले ,गहन ध्यान की अवस्था में निजी मन से निकले डर के प्रभाव से डर कर डिप्रेशन/अवसाद जैसे अनेक मनोरोगों में घिर जाने पर उन ध्यान साधकों का मानसिक संतुलन बिगड़ जाने से वे पागलों के समान असामान्य /अबनार्मल व्यवहार करने लगते हैं । किसी को भी उनके इस गुप्त कुकृत्य का पता नहीं लगता है ।

अतः बिना गुरु के ध्यान साधना करने में खतरा ही खतरा है।ध्यान साधना बिगड़ जाने पर साधक के मन पर बुरा /दुष्प्रभाव के बारे में संक्षेप में ऊपर पैराग्राफ में लिख दिया गया है।प्रश्न है कि :-

क्या ध्यान साधना करने में कोई खतरा, दुष्प्रभाव है ?

अब इतनी चेतावनी पढ़कर भी कोई निगुरा /बिना गुरु का चेला /शिष्य किताबों से पढ़कर (दूसरे की लिखी विद्या चुरा कर ,बिना गुरु के निर्देशन में शोधन किए ध्यान साधना के दौरान या बाद में ध्यान विद्या से हानि उठा जाये तो यह उसका निजी दोष / उसका अपराध होगा ।इसका दायित्व मेरा नहीं है। मैंने जो भी लिखा है वह मैंने निजी ध्यान साधना शोधन अनुभव लिखा है।

एक बार मेरी श्रीमति जी किसी पड़ौसन से पंच तमात्रा सिद्धि की एक शाखा दिव्य ज्योति दर्शन विधा के बारे में जानकारी मिलने पर घर आयी । उसको मेरी ध्यान सधना सिद्ध के बारे में पता चला वह मुझसे दिव्य ज्योति दर्शन ध्यान साधना की कहने लगी । तब मुझे ध्यान साधना हानि उपद्रव का पता नहीं था ।मैंने उपहास में कह दिया कि दिव्य ज्योति दर्शन मंत्र साधना से40 -50 दिन में आता है जो छः माह से लेकर12 महीनों में सिद्ध होता है लेकिन तंत्र साधना से 7 दिन से लेकर 15 दिन में आता है। साधना सिद्ध शोधन में एक वर्ष तक लग जाता है।

मेरी श्रीमती मुझे तंत्र साधना पद्धति से दिव्य ज्योति दर्शन साधना की जिद करने लगी ।मैं भी उसकी बातों में आ गया और उसके शक्ति/ प्राण केन्द्र गति चालन की गतिविधि समझे बिना उसकी विषय पात्रता योग्यता शरीर में प्राणों की प्रज्ञा केंद्र स्थिति पहचाने बिना सूर्य वर्ण क्रम काला ,लाल ,नारंगी ,पीला , बिरोजी , हरा , नीला, बैंगनी , श्वेत आठों रंगों को समझे बिना सीधे सीधे एक दम से रजनीश विधा विधि से ध्यान साधना सिखाने लगा । लगभग पांच दिन बाद उसे दिव्य ज्योति दर्शन की अनुभूति हुई जो रोज बढ़ने लगी। 15 दिन बाद उसकी मानसिक हालत खराब होने लगी । उसकी निंद खराब रहने लगी ।जब वह बिस्तर में मुंह रजाई से ढक कर सोई हुई अलसाई सोई हुई होती तो उसे रजाई से आंखें ढकी बंद होने पर भी घर की सभी चीजें /वस्तुएं अचानक दीखने लगती। कभी कभी तो उसे दीवारों के आरपार भी दीखने लगता । वह सोचती रात है वह सोई हुई नहीं है जबकि वह गहन निद्रावस्था में होती ,कुछ समय बाद उसकी हालत और खराब होने लगी जो पहले उसे गहरी नींद में दिखाई देता था अब वह बिना नींद के जाग्रत अवस्था में भी दिखाई देने लगा । वह परेशान रहने लगी उसे नींद में जगे होने का और जगे होने पर नींद में रहने का भ्रम होने लगा । नतीजा घर के सभी काम खराब होने लगे ।तब वह कहने लगी मुझे पहले जैसी कर दो बहुत हो चुका ज्योति दर्शन मुझे नहीं चाहिए दिव्य ज्योति दर्शन मैं यह नहीं तय कर पा रही हूँ कि मैं सोई हुई हूँ या जगी हूँ किसी भी दिन इस भ्रम की अवस्था में कुछ भी बुरा हो सकता है कोई अनहोनी हो सकती है ।मुझे तो बस पहले जैसी बिना ज्योति दर्शन की बना दो ।

वह तो मेरी पत्नी थी ।खैर बिगड़े काम को ठीक करने का प्रयत्न शुरू किया गया उसी रजनीश साधना विधि से वह सातवें दिन से ठीक होने लगी और 15 दिन बाद ठीक हो गई ।इस घटना से मुझे एक बुरा तजुर्बा /अनुभव यह हुआ कि साधिका मेरी पत्नी थी जिसे मैंने पुनः विपरीत साधना से ठीक कर लिया था । यदि साधिका मेरी पत्नी न होकर कोई अन्य स्त्री या शिष्या होती तो उसे ठीक नहीं किया जा सकता था । क्या वह या उसके परिवार वाले पुनः विपरीत साधना की अनुमति देते , तो इसका भी जबाब है नहीं । परिणाम यह आता कि किसी को भी पता नहीं चलता और वह पागल /अबनार्मल होकर अपना जीवन जीती ।

तभी से मैंने प्रण किया है कि मैं अब किसी को भी इस द्विव्य ज्योति दर्शन साधना की गुप्त /गोपनीय तंत्र विधा विधि तो क्या किसी भी तरह की तंत्र मंत्र यंत्र साधना विधि अगिया बेताल ,भैरवी साधना ,यक्षिणी साधना ,कर्ण पिशाचिनी साधना विधा विधि नहीं बताउंगा । न ही पढ़ाउंगा ।न इस विषय पर चर्चा करुंगा ।क्योंकि मुझे एक बार एक तंत्र की किताब से अगिया बेताल / मूंठ बनाकर चलाने का बुरा अनुभव हो चुका है ।उस शारीरिक अंग पीड़ा को मैं अभी तक नहीं भूला हूँ ,जिसे चलाने के बाद मैं मरते मरते बचा था । मुझे मेरा सहकर्मी देशराज बत्रा बहुत परेशान करता था उसकी आदत सोच स्वभाव अति दुष्टता पूर्ण थे ।मैंने उससे परेशान होकर उसे मारने की नीयत से उस पर अगिया बेताल चला दिया एक दिन वह स्कूटर में पैट्रोल डलवा कर अपने घर आरहा था तो लालबत्ती पर अचानक उसके कपड़ों में आग पैदा होने लगी लोग ताज्जुब में पड़ गए कि अचानक इसके कपडों में आग कैसे पैदा होने लगी ।खैर लोगों ने उसे चेताया और उसके कपड़ों की आग बुझा दी तब किसी ने उसे बताया कि यह किसी कच्चे निगुरे तांत्रिक की करतूत है जो वह बच गया । तब वह अनेकों पड़ियाओं के पास गया तब किसी ने उसे मेरा नाम तो नहीं बताया लेकिन मेरी पहचान शरीर अंग कद काठी और वस्त्र धारण रंग बता दिया और उसे चेताया कि अबकी बार इस लिए बच गया कि तांत्रिक निगुरा बच्चा था लेकिन यदि उससे और ज्यादा छेड़छाड़ पंगेबाजी की तो वह अबकी बार आधी रात में चोट करेगा और अब नहीं छोड़ेगा ।उसे अपनी कमी का पता चल गया है । इधर जब बत्रा के कपड़ों की आग बुझ गई बेताल का मकसद पूरा नहीं होने पर उसने मुझे पर वापसी में हमला कर दिया मुझे बुरी तरह का बुखार चढ़ने लगा शरीर में सुंईयां सी चुभने लगीं मुझे मरण तुल्य पीड़ा होने लगी तब मैंने बेताल को पुनः प्रकट किया उससे क्षमा मांगी और अगिया बेताल को वचन दिया कि अब मैं कभी भी भविष्य में उसे मजाक में परेशान नहीं करुंगा ।अबकि बार वह मुझे छोड़ दें। मेरे परिचितों को जिन्हें भी मेरी इस तांत्रिक करतूत का पता चला वे अपने अपने दुश्मनों को सबक सिखाने के लिए मेरे पास आने लगे मुझे धन देकर तांत्रिक क्रियाओं को पुनः शुरू करने का दबाव बनाने लगे लेकिन मेरा तांत्रिक साधना क्रिया का भूत उतर गया था । तब से मैं अपने सभी शुभचिंतकों को यही सलाह देता हूँ कि तांत्रिक लोगों से बचें उनसे पंगा ना लें और ना ही खुद तंत्र मूंठ अगिया बेताल, भैरवी यक्षिणी चलाएं क्योंकि तंत्र विधा विधि भी उस सृष्टि नियंता.के नियमों से चलती है जिसने मेरे दुश्मन को मेरी तंत्र मार से बचा लिया था ।यदि तंत्र विद्या में इतनी शक्ति होती तो हथियार विधा क्यों पैदा होती? तांत्रिक दुनिया पर छा गए होते किसी को भी जीने नहीं देते । परन्तु तंत्र भी सृष्टि नियंता के कायदा कानून और तांत्रिक की निजी मानसिक शक्ति के तालमेल पर चलता है ।हर कोई तांत्रिक नहीं बन सकता है। अतः किताबों से पढ़कर तांत्रिक बनने के सपने छोड़ दें ।किसी भी दिन अपना कोई तंत्र उटा पड़ सकता है । कितने ही निगुरे तांत्रिक साधक गलत ध्यान साधनाओं से मर चुके हैं ।कितने ही निगुरे तांत्रिक साधक बिना सिद्धगुरु के साधना करनेवाले पागल हो चुके हैं । जैसे मेरे केस में सिद्धगुरु न होने से मैंने दिन में ही तांत्रिक अनुष्ठान शुरू करके हानि उठाइ मेरा तंत्र मुझ पर ही उल्टा पड़ गया । तबसे मेरा तान्त्रिक बनने का सपना उड़ गया है जिसे मैंने दत्तात्रेय के रावण तंत्र पाठ से पढ़कर तंत्र साधना शुरू कर दी थी बिना सिद्धगुरु के निर्देशन में ।

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