आप अपने मन में "गंदे विचारों को आने से" कैसे रोकते हैं?


मन एक समुद्र की तरह से व्यवहार किया करता है ।जिसमें पृथ्वी के निरंतर कम्पन करते रहने से हिलोरें / जल तंरगें उत्पन्न होती रहती हैं ।

अथर्ववेद :: अध्याय काण्डम् १६ सूक्त प्रथम श्लोक संख्या:- ४१५६.—-अपामग्रमसि समुद्रं वो अ/२भ्यव सृजामि

समस्त अपाम वस्तुओं का ग्रम श्याम श्वेत द्रव्य समुद्र ह जहां पर से वह समुद्र अभय भाव से सभी का सृजन अपने अंदर छिपी जलाग्नि से तूफान और शान्तनु तरीकों से करता रहता है।

इसी प्रकार से पृथ्वी भी अपने अंदर छिपी उदर अग्नि से ज्वालामुखी और भूकंप /भूचाल से निरंतर सृजामि कर्म करती रहती है ।

ऐसा ही गुंण मन का ह जो मस्तिष्क में छिपा रहता है ।जिसमें समस्त जग पान / प्रिय : अपान /अप्रिय रुप से छिपा रहता है जिसमें मन की निरंतरता जीवान्तता से तूफान के रुप से विचार निरंतर उग्र रूप से और भूकंप के रूप में धीरे धीरे भूचाल के रुप में प्रचंड रुप से आते रहते हैं ।

यदि मन में गंदे विचार पहले से अपने लोगों ने डाल दिये हैं तो मन की कंपंन्नता गुंण से गंदे विचार आयेंगे । यदि मन में अच्छे बुरे मिश्रित विचार डाले हैं तो मिश्रित अच्छे बुरे वृद्धि दायक धनात्मक घटिया नकारात्मक विचार क्रमिक रुप से या बिना क्रम से आयेंगे । यदि मन में अच्छे विचार डाले गए हैं तो अच्छे विचार आयेंगे ।यह मस्तिष्क के विचार संग्रह और मन की सक्रियता पर निर्भर करता है । यदि। मन में से आने वाले गंदे विचारों को रोकना नियंत्रित करना है तो पहले मस्तिष्क में अच्छे विचारों को डालना /भरना होगा

फिर मन को मस्तिष्क में से विचारों को चुन चुन कर अच्छे विचारों को खींचकर मन को सिखाना होगा । भाव अतीत ध्यान साधना पद्धति सीखकर।

कोई भी वस्तु ब्रम्हांड से प्रकृति में यथार्थ में आने से पहले मन में विचार रुप से आती है फिर वह मन में चित्र के रुप में बाद में शब्दों के समिश्रण से स्वप्न रुप में मस्तिष्क में उत्पन्न होती है उसके बाद इच्छा संकल्प प्रबलता वेग से सृष्टि में उत्पन्न होती है।

अव्वल दर्जे के किषान के खेत में उगने वाले इच्छित पौधे बढ़िया पौधे फसल को हानि/नुकसान देने वाले घटिया पौधे खेत में उगने से पहले किषान के मन मस्तिष्क में उगते हैं ।खेत में बाद में उगते हैं ।जो बढ़िया जागरूक किषान होते हैं वे खरपतवार हानिकारक पौधों के उगने से पहले ही उनको नष्ट करने का उपक्रम शुरू कर दिया करते हैं ।अपने खेतों में खरपतवार उगने नहीं दिया करते हैं ।अधिकतम लाभकारी खेती करते हैं ।

जो कम जागरूक दोयम दर्जे के किषान होते हैं वे भ्रमवश खेत में खरपतवार के जमने पर सक्रिय होकर खरपतवारों को जड़ें जमा ने से पहले नष्ट कर दिया करते हैं ।

जो सोयम दर्जे के किषान होते हैं वे खेत में खरपतवारों के उत्पन्न होने पर सक्रिय होते हैं और अधिकतम व्यय खरपतवारों पर करके खेती की फसलों से कम लाभ उठा पाते हैं ।

जो तलिया स्तर के किषान होते हैं उनको तल में पड़े रहने से खेत में उगे खरपतवार ठीक से नहीं दिखाई देते हैं ।ऐसे जमे हुए खरपतवार फसली पौधों को नहीं परवरिश्त /फलने फूलने देते हैं ।उन खरपतवारों के किषान उन खरपतवार पौधों के औषधीय गुंण विवेचना से खेती से न्यूनतम लाभ /पोषण हीन करते हैं।

उपरोक्त उदाहरण में जागरूक पाठक खरपतवार शब्द की जगह विचार शब्द लिखकर विचारों की खेती करके अपने मन मस्तिष्क में उठने वाले हानिकारक विचारों से होने वाली हानि को नियंत्रित करके अपने मन मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले गंदे विचारों पर नियंत्रण करना सीख लेंगे । विचार उत्पन्न कर्ता अच्छे किषान बनेंगे । विचार विक्रयकर्ता ,विचार व्यापारी ,बनना सीखेंगे।

या फिर हानिकारक पशुओं पौधों से हानि उठायेंगे।

विचारों के किषान/कृषक बनना अच्छा है सभी प्रकार के विचार संग्रह कर्ता कबाड़िया विचार रखना अच्छा नहीं है।

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