पाश्चात्य दर्शन पाश्चात्य दार्शनिक डेविड कोरेश के अनुसार आत्मा निकम्मा आलसी पदार्थ है जो कुछ नहीं करना चाहता । परंतु ईश्वरीय विधान या प्रकृति के नियमानुसार आत्मा कामवासना युक्त गुण वाला है। दोनों गुण विरोधाभासी हैं । ऐसे में आत्मा की मदद के लिए प्रकृति उसे अतिरिक्त पदार्थ विद्युत ऊर्जा / प्राण शक्ति के रूप में देखकर आत्मा को जीव अवस्था में ले आती है । इस प्रकार से आत्मा जीव में बदल जाता है । लेकिन मन/ जी फिर भी निकम्मा पर आलस्य नहीं छोड़ता , यह निकम्मा पन आलस्य ही इसके रात में निद्रा रूप में दिखाई देता है। ऐसे में सभी जीव इन तीन आलस्य (कुछ भी काम न करना पड़े सभी कुछ बिना कर्म किए मिल जाए ) निंद्रा ( काम करने के बाद चढ़ी थकान महसूस होने पर आराम करना ) लालच (सब कुछ/अधिकतम फल/परिणाम अपने आप मिल जाए या बिना खर्च करने पर लाभ ही लाभ प्राप्त हो ) इन जैविक गुणों के कारण सजग सजीव जीव /प्राणी भी निर्जीव समान व्यवहार करते हैं ।कार्य करना पसंद नहीं करते हैं। यदि सपनों से काम चल जाता सपनों से तसल्ली हो जाती तो कोई भी जी कोई भी आत्मा शरीर धारण करके जीव रूप में जमीन पर नहीं आती केवल सपनों में इच्छा पूरी ना होने के कारण सभी जीव आत्माएं शरीर धारण करके जन्म लेते हैं कर्म करते हैं फल प्राप्त करते हैं परंतु सभी को मनवांछित शत-प्रतिशत पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है ऐसे में सभी जीव दुखी रहा करते हैं मनुष्य एक बुद्धिमान बुद्धिजीवी प्राणी है जो अपनी अधिकतम इच्छाओं को पूर्ण करता है ज्ञान कर्म विधा में समर्थ होने से ज्ञान के लिए कल के कर्म भाग्य बनाना सीखने के लिए वह छात्र रूप में विद्यालय में जाता है परंतु विद्यालय में भी गलत शिक्षा प्रणाली से अक्सर छात्र दुखी रहती हैं और वे पढ़ाई से मन चुराने लगते हैं।
यदि मनुष्य को बिना काम किए उसे समस्त सांसारिक भोग पदार्थ प्राप्त हो जाएं और परिश्रम ही ना करना पड़े तो ऐसा मनुष्य कोई भी काम नहीं करेगा ।सदैव सोते रहना पसंद करेगा ।जीवन को सपनों में सो सोकर पूरा कर देगा । मनुष्य का छोटा सा रूप छात्र कहा जाता है। वह भी स्वभाव से निकम्मा आलसी लालची विद्रोही और निद्रालू /शार्ट कट पसंद होता है । परंतु शिक्षा कार्य के दौरान छात्र को इन सभी मौलिक गुणों की बाधाओं का सामना करना पड़ता है ।उसे बहुत परेशानी होती है ।ऐसे में छात्र नहीं चाहता कि उसके दिमाग को कोई काम करना पड़े । क्योंकि शिक्षा मिनट मिनट सेकंड सेकंड पर दिमाग के न्यूरॉन को पल पल पर उत्तेजित करके न्यूरॉन को पीड़ित करती रहती है । जबकि शिक्षक शरीर को /दिमाग को कार्य न करने के कारण छात्रों की स्वभाविक निष्क्रियता से छात्रों को प्रताड़ित करते रहते हैं । अन्य लोग भी दूसरे निष्क्रिय आलसी लालची निकम्मे लोगों को अक्सर के उनके मन को कार्य न करने के कारण अक्सर प्रताड़ित करते रहते हैं । ऐसे में छात्र प्रताड़ना से परेशान होकर शिक्षा से मन चुराने लगता है । इसमें कमी छात्र की कम शिक्षक और समाज की ज्यादा है जो छात्र की शैक्षिक उपलब्धि के कारक मानसिक ऊर्जा शारीरिक ऊर्जा यौन ऊर्जा स्तर की सही समझ नहीं होने से छात्रों को अकारण और आर्थिक रूप से परेशान प्रताड़ित करते रहते हैं।
संसार में मनुष्य की अधिकतम उपलब्धि प्रगति के कारक सांसारिक कारक अनुवांशिकी, क्रियाशीलता , पोषण , रोग से सुरक्षा मस्तिष्क को विकृत करने वाले गलत विचारों से सुरक्षा ,यह सभी कारक छात्र को अधिकतम उपलब्धि दे सकते हैं। परंतु मनुष्य इन सभी बातों की अनदेखी करते हुए केवल और केवल छात्र को लघु मानव ना समझते हुए पशु समझकर ताड़न मारन पीटन के पशु तरीकों से छात्रों को मानसिक रूप से कटु शब्दों से कठोर वाणी से पीड़ित परेशान क्लेश इत करते हुए शारीर को अन्य विविध तरीकों /रूप से ताड़न पीटन करते हुए शिक्षा देते हैं । ऐसे में छात्र शिक्षक समान मानसिक स्तर उच्च ना होने पर अपनी मानसिक परिस्थिति के अनुसार शिक्षा ग्रहण करने के अनुपात के अनुसार ना होने से वह परेशान /क्लेशमय रहने लगता है । शिक्षक उस क्लेशित मन के छात्रों को अपने मन के शिक्षा स्तर के अनुसार उपलब्धि न होने पर न छात्र को प्रताड़ित करता है। ऐसी दुखद भीषण परिस्थिति से परेशान होकर छात्र शिक्षा से मन चुराने लगते हैं । शिक्षक से बचने लगते हैं शिक्षा स्रोत किताबों से चिड़ने लगते हैं ।।
ऐसे में समाज में कमी छात्रों की सबको दिखाई देती है परंतु छात्रिय पक्ष की ओर किसी मनुष्य का, शिक्षक का यह ध्यान नहीं जाता कि जिन छोटे छात्रों को वह पढ़ा रहे हैं ।उन्हें अपनी जैसा बनाना चाहते हैं वह भूल जाते हैं कि उन्हें जब बचपन में पढ़ाया गया था तो वह भी बच्चे थे । उन्हें शिक्षक बनने में एक लंबे समय अंतराल का सामना करना पड़ा है। समाज सुधारक मनुष्य शिक्षक से छात्र से यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि छात्र 1 दिन में 1 घंटे में 1 महीने में 1 साल में शिक्षक के जितना जानकार , ज्ञानवान नीति वान हो जाए । मानव शिक्षक समाज के लोग यह भूल जाते हैं दिमाग के काम करने की अपनी अलग नीति तरीका होता है । यह धीरे-धीरे सीखता है और लंबे समय तक याद रखता है ।।
शिक्षक के दिमाग में जो वीडियो रिकॉर्ड ऑडियो रिकॉर्ड हैं उन्हें लंबा समय अंतराल हो चुका है डाले हुए और छात्र के दिमाग में शिक्षक यह उम्मीद करें किए वीडियो ऑडियो रिकॉर्ड एकदम जल्दी से सेट हो जाए , तो यह शिक्षक की समाज की नासमझी है ।आखिर विधाता ने आयु बनाई क्यों है ? पैदा होते ही मनुष्य को पूरा जवान सक्षम समर्थ क्यों नहीं बना दिया # आखिर कुछ तो वजह है सभी जीवो को उनके शिशु रूप में कुछ समय तक रखने का $ हमारा मानव समाज शिशुओं की बाल अवस्था पर ध्यान नहीं दे रहा है । बच्चों को जल्द से जल्द बड़ा करने की कोशिश की जा रही है। यह बच्चों के साथ मानसिक बलात्कार है ।। उनके दिमाग में बलपूर्वक ज्ञान ठूँसना उचित मानवीय कार्य नहीं है। जिस प्रकार एक छोटी बच्ची भी नारी है एक जवान स्त्री भी नारी है एक वृद्धा नारी है। यदि हम छोटी बच्ची को समय से पूर्व सृष्टि सर्जन निर्माण कार्य के लिए तैयार करने का प्रयास करते हैं जवान स्त्री बनाने की कोशिश करते हैं तो यह शारीरिक योन बलात्कार की श्रेणी में आता है । इसके विपरीत जो वृद्धा स्त्री सृष्टि सृजन क्षमता समय के अनुसार खो चुकी है उस वृद्धा स्त्री को भी सृष्टि सृजन विधा के तहत सृष्टि निर्माण के लिए बाध्य करना भी योन बलात्कार की श्रेणी में आता है कारण कि अब उसकी आयु इस कार्य के योग्य नहीं रही ।
जबकि बच्चों की पढ़ाई के बारे में हम यह भूल जाते हैं किसी भी बच्चे को बचपन पूरा होने से पहले ही उसे जवान बनाना बुद्धिमान बनाना, समय से पहले अत्यधिक जानकारी देकर मानसिक रूप से प्रबुद्ध बनाना उसे बुद्धिमान होने के लिए शब्दों से या अन्य तरीकों से ताड़न मारण करना प्राकृतिक और नैतिक अपराध है। छात्र को समय से पूर्व उन्हें अत्यधिक मात्रा में ज्ञान देकर ज्ञान ग्रहण करने के लिए बाध्य करना करना कि वह दिए गए वीडियो ऑडियो रिकॉर्डिंग शब्द ज्ञान को बलपूर्वक ग्रहण करें , तो यह कृत्य छात्रों के लिए मानसिक बलात्कार की श्रेणी में आता है । जो अभी तो विचारणीय नहीं है लेकिन आने वाले समय में जब लोग संवेदी होंगे छात्रों की मानसिक क्षमता स्तर को समझेंगे । उनकी मानसिक परिस्थितियों का आकलन करेंगे ।अत्यधिक मात्रा में ठूँसे गए ज्ञान से मानसिक असुविधा क्लेश भावना को समझेंगे , छात्रों की भावनाओं को समझेंगे , तो छात्रों को बलपूर्वक शिक्षा देना बलपूर्वक ज्ञान देना जो उनकी क्षमता से बाहर है ।ऐसे असंभव कार्य को मानसिक बलात्कार की श्रेणी में अनैतिक अपराध ,सामाजिक अपराध ,समय पूर्व परिणाम प्राप्ति अपराध माना / समझा जाएगा ।
शिक्षा एक प्रकृति प्रदत्त संपादित नैतिक प्राकृत स्वाभाविक कार्य है जो छात्र की क्षमता अभिरुचि दृष्टिकोण के अनुसार होना चाहिए , ना कि छात्र को शिक्षा दिलाने वाली माता पिता की अभिरुचि दृष्टिकोण के अनुसार हो ।छात्रों के माता-पिता अपनी तरफ इच्छाओं को छात्रों के द्वारा पूरे होते हुए पूरा करते हुए देखना चाहते हैं यह उचित नहीं है क्या छात्र के माता-पिता उन्हें भी अपने माता पिता अर्थात छात्र के दादा दादी की इच्छा के अनुसार शिक्षा प्राप्त की ? यह प्रश्न चिन्ह प्रत्येक माता-पिता को याद रखना चाहिए ।। या छात्र को शिक्षा देने वाले शिक्षक की अभिरुचि दृष्टिकोण के अनुसार हो ःः शिक्षकों को भी अपना छात्रिय बचपन नहीं भूलना चाहिए - कि क्या शिक्षकों ने उन्होंने पढ़ते समय अपने शिक्षक की इच्छाओं के अनुसार शिक्षण अधिगम प्रक्रिया संपन्न की थी तो । इसका जवाब है ना ।।या छात्रों को सलाह देने वाले समाज सुधारक लोगों की नीतियों के अनुसार दृष्टिकोण के अनुसार अभिरुचि के अनुसार छात्रों को शिक्षा देना छात्रों के लिए प्राकृतिक अपराध है।
उल्लेखनीय तथ्य यह है कि छात्र एक्सर्जिक( सजीव उत्सर्जी ) पदार्थ हैं । जिसके निर्माण में प्रकृति की शक्ति के साथ साथ छात्र की अंतरात्मा आत्मक व्यक्तिगत शक्ति भी कार्य करती है । दोनों शक्तियों के संमनवय / तालमेल समायोजन के परिणाम के फल शुरू छात्र का विकास होता है । निर्माण होता है । जबकि मनुष्य ने मशीनों के द्वारा अनेक निर्जीव पदार्थों से तरह-तरह की इच्छा अनुसार पदार्थ बनाकर यह मानवीय मशीनी सोच बना ली है ।कि वह छात्रों का निर्माण भी ऐसे नियंता मनुष्यों के सोच के अनुसार करेगा या ऐसे छात्र बनाए जाने चाहिए जिन्हें हम अपनी सोच के अनुसार , समाज की सोच के अनुसार ,सरकार की सोच के अनुसार , शासन की सोच के अनुसार बनाना चाहते हैं ।। यह नियम छात्र पर लागू नहीं होता है छात्र कोई निर्जीव पदार्थ नहीं है कि उसे मनुष्य अपनी मशीन में , अपनी भट्टी में जब चाहे जैसा बनाकर तैयार कर दे । क्योंकि मनुष्य निर्जीव पदार्थों को उनकी बिना इच्छा के होने पर उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार तैयार कर सकता है। जबकि छात्र में उसकी अपनी भी पूर्व जन्म की संस्कार इच्छाएं, वर्तमान जन्म की पैतृक अनुवांशिक इच्छाएं ,जाति धर्म की संस्कृति इच्छाएं होती है । वर्तमान जन्म की माता-पिता परिवार समाज की इच्छाएं होती हैं । तो ऐसे में वह शिक्षक की सरकार की एकदम सभी इच्छाओं को ज्यों का त्यों ग्रहण नहीं कर सकता है ।
लेकिन छात्रों को ज्ञान देने वाले शिक्षकों की प्रताणना की कमी और शिक्षकों को भी प्रताड़ित करने वाले समाज के समाज नियंता आईएएस या प्रशासनिक अधिकारियों के द्वारा शिक्षकों को रिजल्ट/परीक्षा परिणाम के लिए प्रताड़ित करना किसी को नहीं दिखाई देता जो केवल रिजल्ट रिजल्ट की रट लगाए रहते हैं और छात्र के मन स्तर पर ध्यान नहीं देते । अंता खोतवा में यही कहूंगा कि यह प्रश्न ठीक नहीं है किसी ने भी छात्रों की इच्छाओं मन भावनाओं को समझने की कोशिश नहीं की है छात्रों पर अपनी मनो भावनाएं थोपने का प्रयास करते हुए यह प्रश्न मेरे पास भेजा गया है मैं इस प्रश्न को उचित नहीं मानता हूँ ।
अंततः मैं यही कहूंगा कि छात्र सीखना चाहते हैं लेकिन अपनी शर्तों पर, अपने नियम/कानूनों के अंतर्गत, अपनी इच्छा के अनुसार , अपने समय के अनुसार @ ःः परंतु समाज के सुधारक विचारक लोग छात्रों को सजीव मानव कृति ना समझते हुए छात्रों को निर्जीव मूर्ति पशु समझते हुए यह सोच कर उन्हें ज्ञान देने का प्रयास किया जाता है। छात्रों को शिक्षा में ज्ञान देते समय छात्रों के मानसिक ऊर्जा शारीरिक ऊर्जा के एनर्जी क्वांटम रूल के ( K) काइनेटिक , एल (L) लेबर , एम (M) मैकेनिकल , एन (N) नोटोरियस , ओ(O)ऑपरेटिंग , का ध्यान नहीं रखा जाता ह और ना ही छात्रों को शिक्षा लाइफ क्वाडरेंट रूल जीवन में ऊर्जा उपयोग के अनुसार दी जाती है- तो ऐसे में वह ज्ञान को ज्यों का त्यों ग्रहण कैसे कर लेंगे ? छात्र अपनी मनमर्जी के अनुसार अपने हिसाब से अपने हित के हिसाब से अपना मनचाहा प्रणाम देंगें । असली नकली छात्रों को परिणाम के लिए विवश करने वाले शिक्षक , परिवार, समाज के, शिक्षा पद्धति और सरकार के उद्देश्य पूरक परिणाम के अनुसार छात्रों का परिणाम आएगा , ऐसी आशा सोच बुद्धिजीवियों के लिए उचित नहीं है कि छात्र उनके अनुसार मनचाहा परिणाम देंगे । आखिर छात्रों का भी तो अपना वर्चस्व होता है उनके भी अपनी इच्छाएं आशाएं वासना संस्कार होते हैं जो उन छात्रों के मन के अवचेतन मन स्तर में पड़े रहते हैं । जिन्हें हटाना निकालना आसान काम नहीं है ।। ,जबकि सभी ज्ञानदाता , ज्ञानी जन , शिक्षक और प्रबुद्ध जन भूल जाते हैं प्रकृति में तरह-तरह के पशु आखिर क्यों बनाए ? किसने बनाए ? तो ठीक इसी प्रकार मानव जाति में भी तरह-तरह के मनुष्य तरह-तरह के पशु संस्कार के प्रभाव से दिखाई देते हैं ! सभी का अपना महत्व है ॥
सब लोग ना आईएएस बन सकते, ना आईपीएस बन सकते ,न शिक्षक बन सकते , ना वकील बन सकते , न राष्ट्रपति बन सकते , न प्रधानमंत्री बन सकते , न इंजीनियर बन सकते ,न पुलिस या रक्षा कर्मी बन सकते , यह था ःः आधुनिक सोच के अनुसार उत्कृष्ट वर्ग के लोगोँ का चरचरा । अब हम चर्चा करते हैं निम्न वर्ग के श्रेष्ठ आवश्यक सेवाओं को देने वाले परम आवश्यक लोगों की @ ःः अक्सर लोग इन सेवक /श्रमिक लोगों की दिनभर की सेवाओं पर ध्यान नहीं देते । लेकिन सच यह है कि समाज के सपनों का साकार निम्न वर्ग के लोग ही अपने श्रम से दूसरे बुद्धि जीवी लोगों के सपने साकार करते हैं । अपने श्रम कृति से तरह-तरह की प्रतियां बनाकर तरह-तरह के पदार्थ बनाकर । तरह-तरह से लोगों को सेवा सहयोग देकर ।। उत्कृष्ट वर्ग के लोगों के पास विचार तो हैं लेकिन श्रम शक्ति नहीं है निम्न वर्ग के लोगों के पास श्रम शक्ति नहीं है लेकिन विचार नहीं है और इस प्रकार से विचार और श्रम शक्ति के मिलने से ही सृष्टि में समाज परिवार में सर्वत्र निर्माण विनाश कार्य संपादन हो रहा है । ऐसे में छात्रों को भी परम आवश्यक लघु मानव समझा जाए। किसी भी राष्ट्र समाज परिवार घर का अस्तित्व उसके छात्रों पर निर्भर है ऐसे में छात्रों के मनोभावों को समझते हुए शिक्षा छात्रों के रूचि अभिरुचि दृष्टिकोण के अनुसार दी जाए । ना कि शिक्षा भार बनाकर छात्रों के ऊपर ला दी जाए ।। तो मैं कहूंगा प्रश्न कर्ता महोदय जी :- छात्र सीखना चाहते हैं । परंतु गलत शिक्षा पद्धति , गलत शिक्षा नीति और गलत शिक्षक व्यवहार के कारण सहित , छात्रों की रुचि के अनुसार पाठ्य पुस्तक उपलब्ध न हो पाने के कारण छात्र पढ़ाई में अनावश्यक श्रम से बचने के लिए छात्र पढ़ने से बचते हैं । छात्र शिक्षा से मन नहीं चुराते हैं । छात्रों को शिक्षा से जी चुराने के लिए/ बचने के लिए भारी भार दायक शिक्षा पद्धति दोषी है और शिक्षकों द्वारा छात्रों पर अनावश्यक दबाव बनाने के लिए सरकार के प्रशासनिक कर्मचारी उत्तरदाई हैं।
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