वामपंथ का धीरे-धीरे खत्म होने का मुख्य कारण क्या है?


वामपंथी विचारधारा का अर्थ है जीवन जीने के लिए वामावर्ती गति से चंद्र गति से जीवन जीना इस विचार धारा का उदय कार्लमार्क्स के द्वारा अस्तित्व में आया था । यह विचार धारा तीन मुख्य बिन्दुओं पर केंद्रित है 1:-, जीवन जीने के लिए समाज को नियंत्रित करनेवाले शासक शासन का विरोध करना , 2:- दूसरे अन्य समाज समूह जाति धर्म वर्ग को मानव जीवन को नियंत्रित करने वाले का विरोध करना ।वह भी बिना किसी ठोस कारण से ।3:- तीसरा मुख्य कारण जो वामपंथियों ,/वाममार्गियों के विलुप्तप्राय होने का कारण बन रहा है वह है समस्त भौतिक आर्जित बौद्धिक संसाधनों पर सभी का समान अधिकार जिसके अनुसार सभी को अपना जीवन सुख समृद्धि के अनुसार जीने का समान अधिकार अर्थात कोई भी किसी प्रकार की सम्पत्ति निजी संपत्ति नहीं , सभी की संपत्ति का राषट्रीयकरण होना चाहिए ।परन्तु समान संपत्ति के लिए समयानुसार जब समान कर्म कार्य क्षमता दक्षता की बात की जाती है तो वामपंथी विचारधारा वाले वाममार्गिय लोग बगलें झांकते लक्ष्य भ्रमित नजर आते हैं ।जो इनकी बिना कर्म करने के संपत्ति अर्जित करने की सोच की ओर इशारा करती है ।

आज के प्रगतिशील युग में जब लोग पढ़ लिख कर अपने निजी विचारधारा अपने अनुसार बना रहे हैं परंतु विचारधारा अपने अनुसार बनाने के बाद भी लोग अपनी विचारधारा को दूसरे लोगों की विचारधारा से मिलान करते हैं उसके बाद दोनों विचारधाराओं के मध्य का सामंजस्य पूर्ण समझौता वादी दृष्टिकोण अपनाने लगे हैं जो शिक्षित होने की सही पराकाष्ठा कही जाती है ऐसे में लोगों की अपनी निजी सोच सामंजस्य वादी बन जाने से उनमें दूसरे लोगों के अकारण विरोध करने की प्रवृत्ति समाप्त खत्म होती जा रही है । जिससे वामपंथी विचारधारा खतरे में आ रही है ।

या हम कह सकते हैं कि वामपंथ धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है वामपंथ के इतिहास पर गौर करें जो कि इसके दार्शनिक प्रथम विचारक कार्ल मार्क्स और मूसा थे जो मानव समाज मानव जीवन को नियंत्रित प्रभावित करने वाले राजा की व्यवस्था के प्रबल विरोधी थे । उन्होंने अपने लोगों को बताया / समझाया था कि यदि हम अपने जीवन को राजा के नियंत्रण में रहकर जिएंगे तो हम मनुष्य नहीं हैं । हम भी पशुओं जैसे ही हैं कारण कि पशु भी स्वार्थ और भय के वशीभूत होकर अपना जीवन दूसरों के प्रभाव से प्रभावित होकर जीते हैं । मनुष्य तो वह है जो अपने जीवन को अपनी इच्छाओं के अनुसार आवश्यकता ओं के अनुसार न्यूनतम स्वार्थ और भय से मुक्त होकर जिए तभी वह कार्ल मार्क्स के अनुसार के अनुसार जिए वह मनुष्य कहलाने का हकदार है।

सभी राजा लोग जो समाज के नियंत्रण केंद्र बिंदु होते हैं वे समाज के लिए तो नियम कायदे कानून बनाते हैं संविधान बनाते हैं लेकिन अपने लिए निजी विशेष हित नियम कानून / विशेषाधिकार संविधान नियम कानून से कुछ अलग हटकर बनाते हैं । जिनमें राजा के विशेष नियम कहे जाते हैं । यह राजा को समाज से अलग करता है ।जबकि वामपंथी विचारधारा के अनुसार राजा भी एक सामान्य साधारण पुरुष है उसे भी समाज के नियमों के अनुसार अपना जीवन जीना चाहिए जैसा की रामायण में राम ने अपना जीवन जिया।

वामपंथ की विचारधारा के अनुसार दूसरे लोगों का दूसरे मानव समूह , मानव समाज , मानव प्रजाति , जाति धर्म वर्ग के लोगों का उनके धार्मिक सामाजिक आर्थिक परंपराओं का बिना सोचे समझे अकारण विरोध करना उचित नहीं है । यह मनुष्य को मनुष्य से अलग करने जैसा है ।

वामपंथियों की दूसरी विचारधारा राजा का कारण विरोध करना यह नियम भी विस्तारित वृहद मानव समाज संगठन के विस्तार को समाप्त करके मानव समूह संगठन को शनै शनै छोटा करते हुए मानव समूह संगठन को मानव स्तर पर लाकर मनुष्य के मनुष्य होने में बाधा डालता है । क्योंकि मनुष्य का सबसे बड़ा सामाजिक सामूहिक होना उसे पशुओं से अलग करता है । पशुओं के समूह समाज संगठन सीमित और छोटे होते हैं । जबकि आज के समय में मनुष्य का सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्तर से उठकर विश्व स्तरीय संगठन पर आ गया है ऐसे में वामपंथी विचारधारा का औचित्य आवश्यकता लोग समझ गए हैं। और उनमें भी अपना निजी विकास विस्तार की भावना उत्पन्न हो गई है जिससे वह भी राजा जैसी शासक समाज नियंता जैसी सोच को समझ कर अपने अंदर नई सोच उत्पन्न कर रहे हैं । जिससे विश्व में सभी जगह नई आर्थिक व्यवस्था विश्व भूमंडलीकरण का सूत्रपात हो चुका है । जिसमें युद्ध और संघर्ष जैसी मूल सामाजिक पशुज प्रवृतियां अब खतरे में आ गई है। लोगों ने लड़ना अकारण दूसरों को मारना दूसरों के अधिकारों को समाप्त करना जो पुरानी पाशविक प्रवृतियां थी । उन्हें समझ कर अब उनका कारण विरोध करना बंद कर दिया है । बल्कि लोगों ने अब दूसरे लोगों दूसरी भाषा संस्कार जाती संस्कृति परंपराओं को अपने अनुसार अपने हित के अनुसार सोचना समझना आरंभ कर दिया है । वर्तमान आज के शिक्षित लोग दूसरे लोगों को दूसरों को उनके विचार भावनाओं को धारणाओं को रीति-रिवाजों को समझने की कोशिश करते हैं। और उनमें जो भी उन्हें उचित लगता है उसके अनुसार अपना जीवन जीने की कोशिश करते हैं ।

ऐसे में वामपंथ की विचारधारा निरर्थक सिद्ध हो गई है और वामपंथी विचारधारा के देश सोवियत संघ नष्ट हो चुका है तथा दूसरा विशाल वामपंथी विचारधारा का देश चीन की स्थिति भी खतरे में आ रही है जगह जगह वामपंथी /वाममार्गी क्षेत्रों में निजी हित समर्थकों की फौज, भाई भतीजावाद, भ्रात वाद ,जाति वंश वाद , भाषावाद क्षेत्रवाद जातिवाद जैसी नयी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं।

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