प्रत्येक व्यक्ति के औरा या आभामंडल का रंग उसके ओजसरंग पर निर्भर करता है ।यह त्वचा की निजी विशेष चमक होती है जो प्रत्येक मनुष्य की अलग अलग होती है । जो उसके अनुवांशिक गुंणों और निजी विचारों पर निर्धारित किया करती है ।
शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण का औरा शुक्ल वर्णीय (पीला रंग ज्यादा हरा रंग कम के समिश्रण जैसा ) पुखराज मणि जैसा होता है । क्षत्रिय का औरा लाल रक्त वर्णिम होता है ।वैश्य / वणिक का औरा पीत वर्ण भूमि /पीले रंग का होता है । सेवक /सेवादार का औरा आकाशीय चमक नीला /नीलम, नील मणि जैसा होता है ।शूद्र का औरा श्याम वर्ण से लेकर कृष्णिका वर्ण /काला रंग का होता है ।
इस को एक जाति से न जोड़कर देखा जाय । प्रत्येक जाति में पाँचों वर्णों के लोग होते हैं । यह औरा के पाँच मुख्य रंग हैं ,इसके अलावा इन मुख्य पाँचों रंगों के कयीई अनेक उपम रंग बनते हैं जो पारखी की दृष्टि बारीक होने पर पारखी को दिखाई देते हैं जैसे शुक्ल वर्ण में पीला रंग अधिक होने पर या हरा रंग अधिक होने पर या लाल रंग जुड़े होने पर पीले पके आम जैसा , पके अमरूद के पीले रंग जैसा या पीला नारंगी रंग का दिखाई देता है । इसीप्रकार से क्षत्रिय वर्ण का लाल और सिंदूरी से कत्थई या कत्था रंग जैसा दिखाई देता है।वैश्य वर्ण के पीले रंग में नीलिमा मिश्रण से नीलाभ पीला /नीलोफर जैसा दिखाई देता है।
किसी के भी औरा का रंग स्थिर स्थाई नहीं होता है यह औराधारी जातक की अनुवांशिकता तथा उसके शारीरिक स्वास्थ्य ,मानसिक स्वास्थ्य पर निर्भर करता है । बीमार होने के स्थिति से पहले औरा का रंग उतरकर हल्का पड़ जाता है । बीमारी के दौरान रोग की रूग्णता के वेगास के अनुसार बदलता है ।जब रोगी का गहरा नीलाभ या श्याम कृष्णिक वर्ण हो जाता है तो अशुभ सूचक माना गया है। स्वस्थ्य मनुष्य के औराधारी रंग और बीमारी में मनुष्य के बदले हुए समान रंग को एक प्रभाव गुंण का नहीं माना जाना चाहिए ।
मेरी तीन पुत्रीओं का औरा का रंग जन्म के समय बड़ी पुत्री का लाल रंग का था जो बड़ी होने पर पीला हो गया ।मंझली /बिचली का औरा पैदा होने के बाद से दस साल तक शुक्ल वर्णिम सुआ पंखी हरियल जैसा था जो बीस साल की आयु तक पीला रहा और बीस वर्ष के बाद लाल रंग का हो गया । छोटी पुत्री का और पाँच वर्ष तक सिंदूरिया रहा पंद्रहवें साल के बाद पांडुवर्ण का हो गया । बेटे का जन्म के समय औरा पीला लाल था जो बाद में बड़े होने पर क्रूर भाव आ जाने पर कत्थई /तांबई रंग का हो गया।
इस प्रकार से सभी का और परिवर्तन शील होता है जो उसके विचारों की प्रबलता से शारीरिक स्वास्थ्य के अनुसार बदलता रहता है । शेष है बाद में जोड़ा जाता रहेगा
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