हमारे दिमाग के तीन मुख्य स्तर है अचेतन स्तर और चेतन स्तर और चेतन स्तर
ज्यादातर लोग चेतन स्तर से अपना जीवन जीते हैं । जो लोग अपने जीवन को अपने चेतन स्तर से जीते हैं वह अपने मस्तिष्क में संचित पुरानी स्मृतियों का उपयोग करते हैं या फिर श्रुतियों सुनी सुनाई बातों के शब्दों का उपयोग किया करते हैं । जो वर्तमान में घटनाएं घट रही हैं घटना उनके अनुसार अपने मस्तिष्क में संचित पुरानी स्मृतियों का श्रुतियों का उपयोग घटनाओं के प्रति संवेदना व्यक्त करने के लिए क्रिया प्रतिक्रिया अनुक्रिया के रूप में करते हैं इसमें कभी सही प्रतिक्रिया होती है कभी गलत प्रतिक्रिया होती है और कभी विपरीत प्रतिक्रिया होती है । इसमें विपरीत प्रतिक्रिया का हमें भयंकर रिजल्ट मिलता है गलत प्रतिक्रिया का हमें गलत रिजल्ट मिलता है और सही प्रतिक्रिया का हमें सदैव सही रिजल्ट मिलता है जिस पर हमारी तरक्की निर्भर है इस चेतना स्तर का जीवन में सही सही उपयोग केवल सभी १०० % में 10% से 1% तक करते हैं जिसमें 10 उच्च बौद्धिक गुणांक कहा जाता है और 1 निम्न बौद्धिक गुणांक कहा जाता है। निंबोद गुणांक की शुरुआत अपना जीवन जीने वाले सभी निम्न तर कोटि की पुरानी पशु पक्षियों और मूर्ख मनुष्यों से शुरू होती है जो तीन प्रकार की प्रतिक्रिया है दिया करते हैं जबकि जो उच्च बौद्धिक गुणांक वाले लोग हैं उनके हमेशा क्रिया की प्रतिक्रिया मिलती है उनके विपरीत क्रिया अनुक्रिया का प्रतिशत बहुत कम होता है । विपरीत क्रिया गलत प्रतिक्रिया देने के कारण इनके जीवन में संघर्ष की प्रतिशतता कम होने से इनकी आयु अधिक होती है और ऊर्जा का सही सदुपयोग होने से इनके कार्य के अधिकतम अधिकांश परिणाम सार्थक आते हैं इनके बीच मध्य बुद्धांक के लोग रहते हैं जो मिश्रित प्रक्रिया कभी सही कभी गलत के दौर से अपना जीवन जीते हैं ।अवचेतन स्तर पर उनकी पकड़ सोच सही सटीक नहीं होती जिससे इनके बौद्धिक अनुमान प्राय सही सटीक नहीं निकलते हैं।कभी ये बुद्धिमान स्तर के निकट चले जाते हैं तो कभी कभार मूर्ख /पशुज स्तर बुद्धि के निकट चले जाते हैं।
परा विद्या :—जो लोग अवचेतन स्तर पर अपने जीवन को जीते हैं उनके चेतन अवचेतन स्तर में सहसंबंध समानता निकटता होने से उनमें जन्मजात अवचेतन स्तर मस्तिष्क सक्रिय होने से उन्हें तरह-तरह की रिद्धि सिद्धि प्राप्त होती हैं । या कुछ लोग कुछ विशेष शिक्षा साधना पद्धति के द्वारा अपने मस्तिष्क के अवचेतन स्तर को गुरु ज्ञान कृपा से सक्रिय कर लेते हैं । उनके चेतन मस्तिष्क का अवचेतन मस्तिष्क से सहसंबंध अच्छी प्रकार से हो जाता है । ऐसे में उन्हें अवचेतन मन से जो भी तरह-तरह की ब्रह्मांड की घटित अतीत ( पुरानी व्यतीत घटनाएं स्वप्न रुप में मिलती हैं या घटना के घटने से पूर्व की सूचना आगम सपनों के रूप में मिलती हैं या ऐसे लोग जो लोगों की आवश्यकता ओं के अनुसार स्वप्न देखने कल्पना करने मैं अब व्यस्त होते हैं । पूर्व सूचनाएं को घटित घटना से पहले जान लेते हैं । वह उन घटनाओं को सक्रिय मस्तिष्क में डालकर उनका सही विश्लेषण करके उन्हें अपने निजी जीवन में कार्य क्षेत्र में उपयोग करते हैं । ऐसे लोग कल्पनाशील और सही सटीक दिवास्वप्न देखने वाले जो अपने सक्रिय मस्तिष्क और अवचेतन मस्तिष्क दोनों का संयुक्त समर्थन उपयोग करके अपने जीवन को जीते हैं उन्हें हम पार विद्या विज्ञानी कह सकते हैं प्राय जोशी और जन्मजात सही भविष्यवाणी करने वाले लोग परा विद्या के ज्ञाता कहे जाते हैं तो उन्हें ब्रह्मांड की घटित घटनाओं के अतीत की और भविष्य की आभासी सही जानकारी प्राप्त हो जाती है जिससे परा विद्या कहा जाता है । घटित घटना होने का अगम का घटना घटने से पहले सही पूर्वानुमान लगा देने की कला परा विद्या कही जाती है।
अपरा विद्या :— परंतु जो लोग अपने जीवन को सक्रिय चेतनता के आधार पर जीते हैं जो पैदा होने के बाद शब्द ज्ञान चित्रांकन ज्ञान पर निजी आधारित शिक्षा ग्रहण करते हैं वह शिक्षा जो उन्हें माता पिता गुरु मित्र समाज के द्वारा मिलती है वह अपरा नाल विद्या कही जाती है यह श्रुति स्मृति पर आधारित है जो माध्यम संपर्क संबंध के आधार पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में एक परिवार से दूसरे परिवार में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को उसके निजी संपर्क के माध्यम से प्राप्त होती है और उस प्राप्त विद्या को मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार अपनी माता से , अपनी माता से जुड़े पुरुष का अपने पिता के द्वारा , समाज की अपरा से जुड़े पुरुष गुरु से , अपने मित्र मंडली परिवारिक परिवारिक संबंधों से प्राप्त करता है । यह अपरा विद्या हमें अपने निजी संबंधों पर आधार से प्राप्त होती है इस अपरा विद्या के द्वारा मनुष्य अपनी विद्या को अपने प्रिय पात्र संबंधियों को देता है।
ब्रह्म विद्या : — वह शिक्षा है जो मनुष्य को भ्रम से बचाकर निरंतर सत्य ज्ञान देकर सत्यता की ओर अग्रसर करते हुए उन्हें समाज में प्रगति पथ के शिखर की ओर ले जाती है जिसके आधार पर मनुष्य की समाज में राजनीतिक आर्थिक भौतिक प्रगति होती है । मनुष्य एक कुशल तांत्रिक विद्या तंत्र विद्या या सिस्टम में रहते हुए सिस्टम को समझते हुए सिस्टम के अनुसार कार्य करना और स्वयं सिस्टम के सर्वोच्च पद के ऊपर बने रहना अर्थात अफसर या राजनेता का स्थिर होना वर्तमान में तंत्र विद्या या सिस्टम विद्या कही गई है । जबकि पूर्व काल में यह तंत्र विद्या ( सिस्टम विद्या ) लोगों का इंद्रजाल विद्या कही जाती थी । जिसे जादू कहा जाता था और इस जादू को लेकर लोगों ने अपनी अपनी मानसिक शक्ति के आधार पर तरह-तरह के मेंटल मॉड्यूल बनाकर लोगों को पहले जादू के रूप में पागल करते थे । अब वर्तमान में पद पर प्रतिष्ठित होकर पद से नीचे के लोगों को अपने मेंटल मॉड्यूल से पागल बना कर लोगों को तरक्की नहीं करने देते हैं । और आप समाज के सर्वोच्च नियंत्रक पद पर बने रहते हैं । इसे राज विद्या या शासन विद्या कहा जाता है यह केवल उन्हीं लोगों के द्वारा संचालित होती है जिनमें अंतर्दृष्टि या दूसरों को देखकर सोचकर करने की विधा विकसित हो जाती है । जिसके अनुसार राजपरिवार का जीवनकाल वीडियो तक बना रहता है । साधारण परिवार का जीवन काल एक या दो पीढ़ी के बाद समाप्त हो जाता है बिखर जाता है ।
ब्रह्मा विद्या प्राप्त होने के पश्चात मनुष्य सामाजिक प्रगति की ओर चल पड़ता है। ब्रह्मविद्या अतीत में ब्राह्मणों के पास थी है और रहेगी ःः इस ब्रह्मविद्या के प्रभाव से ब्राह्मण जाति अपने वर्चस्व को आदिकाल से आधे रूप में सुरक्षित किए हुए हैं वर्तमान में यह ब्रह्मविद्या बाबा विद्या के प्रभाव से खंडित हो चुकी है जिससे ब्राह्मणों का पतन हो रहा है और निर्धन दरिद्र गरीब लोग भी अपने को ब्राह्मण कहने लगे हैं जबकि ब्रह्मविद्या धारी ब्राह्मण कभी भी निर्धन दरिद्र गरीब नहीं हो सकता इसे आप वर्तमान में कलयुग ए आईएएस या कलयुगी ब्राह्मण से समझ सकते हैं ।
पार ब्रह्म विद्या : — भी ब्रह्मविद्या का एक संशोधित कर्म विद्या है । जो मनुष्य को कर्म मार्ग की ओर ले जाती है जिसमें उसे अपने कर्म के अनुसार अच्छा और बुरा दोनों परिणाम मिलते हैं । जिसमें से वह अच्छे परिणाम को स्वीकार करता है प्राप्त अच्छे परिणाम को बढ़ाने की इच्छा करता है अच्छे परिणाम को धारण करता है ।और बुरे परिणाम को स्वीकार नहीं करता इस बुरे परिणाम को वह ईश्वर या विधाता की कुदृष्टि कहता है । जबकि यह बुरा परिणाम ईश्वर या विधाता की कुदृष्टि नहीं अपितु प्रकृति का नियम है जिसमें जो जीव जैसा करता है ठीक उसके साथ उसी के अनुरूप परिमाण में प्रकृति भी विपरीत कार्य करती चलती है । यदि जीव /मनुष्य अच्छा और प्रिया कार्य करता है है तो भी प्रकृति उसके साथ साथ बुरा और अप्रिय विपरीत कार्य करती रहती है । जिसका मनुष्य को आभार एहसास नहीं होता परंतु जब वह कर्म हीन कर्म में असमर्थ असफल निष्फल हो जाता है तो प्रकृति उस मनुष्य को अपने द्वारा संचित बुरा बुराकर्म फल जो अच्छे कर्म करने के दौरान प्रकृति के पास इकट्ठा हो गया था उस पुराने संचित बुरे इकट्ठा कर्म फल को देने लगती है । जिसे उस मनुष्य का दुर्भाग्य या बुरा भाग्य कहा जाता है जिसे प्राप्त होने पर। मनुष्य समाज में विधाता से शिकायत करता रहता है कि मैंने तो अच्छे अच्छे कर्म किए थे मुझे बुरा कर्मफल किसका क्यों मिल रहा है जबकि ईश्वर और प्रकृति दोनों ही सत्य हैं इनसे गलती की संभावना नहीं हो सकती है । इस ब्रह्मविद्या में ब्रह्म के साथ भ्रम जुड़ा होने से अच्छे के साथ बुरा बुरे के साथ अच्छा परिणाम मिलता है तो जीव दुखी होता है परंतु पार ब्रह्म विद्या में मनुष्य अतीत आगम आगम का ज्ञान होने से किसी भी कर्म को करने पर उसके बुरे परिणाम से बच जाता है अर्थात मनुष्य को बुरा कर्म करने पर भी उसका बुरा परिणाम बहुत ही कम आंशिक रूप में मिल पाता है जिससे यह पारब्रह्म विद्या कहीं जाती है। पार ब्रह्म विद्या के अनुसार जब मनुष्य को इसी कर्म के अमृतसर नाम का बोध हो जाता है तो वह अप्रिय परिणाम के बाहर से बचने के लिए अपने कर्म को इस समझदारी से करता है कि उससे कर्म विपरीत अप्रिय प्राकृतिक कर्म के बुरे परिणाम पाप की आंशिक प्राप्ति नहीं होती क्योंकि उसने कर्म निज अपने हाथों से नहीं किया था उसने अपने कर्म को दूसरे के हाथों से अफसर या नेता के रूप में कराया था जिससे उसे पुन्य और सिर्फ पुन्य फल प्राप्त होता है । पापफल की प्राप्ति नहीं होती है ।उस मंजे हुए अफसर नेताओं का उसका जीवन सुखी शांत रूप में व्यतीत होता है मन व्यथित नहीं होता है क्योंकि वह अप्रिय कर्म अतिकर्म दुष्कर्म अपने निज हाथों से स्वयं नहीं करता अपितु अपने कर्मों को कराने के लिए दूसरे के हाथों का उपयोग करना जानता है। यह है पार ब्रह्म विद्या जो केवल अफसरों और नेताओं को आती है।
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