समाज के बनाए गए कुछ गैर जरूरी नियमों को यह जानते हुए भी कि वो सही नहीं है, हम उन्हें क्यों नहीं तोड़ पाते हैं?


समाज मनुस्मृति पर आधारित सामाजिक विधान के आधार पर नियंत्रित है कहने को हम कुछ भी मनुस्मृति के विपरीत कुछ भी कह/बोल सकते हैं लेकिन मनुस्मृति में लिखे हुए नियम घर परिवार समाज में पैठ बनाये हुए हैं । अब आपने जो लिखा कुछ गैर जरूरी नियम से आपका आश्य /मंतव्य स्पष्ठ नहीं हो रहा है :- कि आप को कौन-कौन से समाज परिवार के नियम गैर जरूरी /अनावश्यक लगे ,जो आपको सही नहीं लगते हैं उनको भी आप मजबूरी वश सहन करके अपना जीवन मन मारकर /दबे हुए मन से समाज में जी रही हैं ।

अब आपके प्रश्न का विवेचनात्मक जबाव :- जो लोग समाज में धन के अभाव में अपना जीवन यापन कर रहे हैं वे धन की कमी से कर्म काण्ड हीन या पाखंड हीन - न्यूनतम कर्म काण्ड वाला जीवन यापन करते हैं मजबूरी वश आप जिनसे प्रभावित हो सकती हैं ।कारण कि धनहीन लोगों के जीवन में मान-मर्यादाओं और कर्म काण्ड पाखंड की कमी होती है ,कर्मकांड पाखंड का मनुष्य की आर्थिक स्थिति से सीधे सीधे संबंध होता है ;धनहीन कर्मकांड पाखंड किससे करेगा जब समस्त कर्मकांड पाखंड का आधार धन ही उन निर्धन लोगों के पास नहीं होता है। निर्धन गरीब लोगों के उनकी जीवन पद्यति में मानव समाज के नैतिक मूल्य अलग अलग होते हैं ।

जो लोग धनयुक्त ऐश्वर्य पूर्ण जीवन जी रहे हैं उनके पास सभी धर्म कर्म काण्ड के लिए पर्याप्त धन है उनको धर्म कर्म काण्ड पाखंड युक्त नियम समाज पद्यति से जीवन जीने में कोई असुविधा नहीं है ।धनी लोगों का उनके कर्म कांड पाखंड युक्त जीवन का समाज में विरोध नहीं किया जाता है पाखंड ही समाज में दृश्य होता है जबकि करमकांड अदृश्य होता है और धर्म शंकामय होने से तरह तरह की शंकाएं पैदा करता है ।जिससे लोग धर्म के प्रति विश्वनीय नहीं होते हैं और अक्सर धर्म बदलते रहते हैं ।पाखंड दृश्य होने से सबको दिखाई देता है इस सभी धर्म में अपने पाखंड को अच्छा बताया जाता है और दूसरे धर्म समाज के पाखंड की धज्जियाँ उड़ाते हुए उनकी धर्म समाज से निष्ठा को हिलाकर/डिगाकर अपने अपने धर्म समाज का संस्कृति का प्रचार प्रसार किया जाता है । सभी धर्म समाज में पाखंडी धनवान लोगों की स्थिति रुतबा सम्मानजनक होता है जबकि सभी धनी व्यक्ति अपने जीवन को अपने हिसाब से आधुनिक तरीक़े से अपने जीवन को अकेले होकर पड़ते हुए असामाजिक तरीके से जी रहे होते हैं ।

अधिकतर लोग अपनी जिंदगी पुराने लिखे मनुस्मृति के सामाजिक विधान के अनुसार जीते हैं मनुस्मृति आदिकाल का लिखा सामाजिक विधान ग्रथ है इस में जो भी बातें लिखीं हैं वे पुराने समय देश काल क्षेत्र परिस्थिति के अनुसार उस समय सही सत्य थीं लेकिन आजकल काल परिस्थिति परिवार देश समाज में हुए अनेक परिवर्तन के बाद , आज कुछ पुराने अनेक वैधानिक मनुस्मृति के नियम पूरी तरह से नहीं आंशिक रूप से बदल गये हैं जैसे विधवा (रांड)विधुर(रंडुवा),परित्यकता (अहिल्या सर्ग ) , परिवेत्ता (छिकैला ) आदि प्रथाएं रीति-रिवाज अभिशापित न होकर बदल गये हैं , जनसामान्य हो गये हैं ।लेकिन कुछ नियम कुछ समाज परिवारों में आज भी ज्यों के त्यों सार्थक बने हुए हैं।

इसके लिए सभी को परिवर्तन वादी नियम और परिवर्तन वादी व्यवस्था को समझने की जरुरत है ।जो लोग इस परिवर्तन शब्द को ठीक से पूरी तरह समझ जाते हैं वो परिवर्तन को समझते हुए परिवर्तन की दृष्टि से खुद में अपनी सोच विचार में अपने घर परिवार में वंश कुल जाति धर्म समाज में उचित आवश्यक परिवर्तन करते हुए निरंतर उन्नति /तरक्की करते हुए घर परिवार वंश कुल जाति में. शिखर पर बने रहते हैं ।जो परिवर्तन को समझ नहीं पाते हैं वे परिवर्तन को न समझ पाने की स्थिति में परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए अकाल मौत या बेमौत मर जाते हैं या मार दिए जाते हैं या फिर यदि जीवित रहे तो निरंतर पतन अधोगति दुर्गति को प्राप्त होकर निर्धनता गरीबी दरिद्रता में जीवन जीने को विवश होते हैं ।यह परिवर्तन की प्रक्रिया व्यक्ति से परिवार घर वंश कुल गोत्र जाति धर्म समाज की ओर निरंतर चल रही है ।परिवर्तन का जहाँ पर भी प्रबल विरोध किया जाता है वहीँ पर परिवर्तन से संघर्ष करनेवाला मारा जाता है अशक्त बुद्धिहीन बलहीन धनहीन श्रमहीन मानव । जब और जहाँ पर भी होने वाले परिवर्तन को समझ कर उसके लाभ हानि के गणित को समझते हुए लाभ के पक्ष को बलवान होते हुए देखकर लाभ की दिशा को देखते हुए अपने में घरसमाज में परिवर्तन कर लिया जाता है या परिवर्तन से सामजस्य बिठाते हुए परिवर्तन से लाभ उठाया जाता है तो यह प्रयोग प्रक्रिया समझदारी/बुद्धिमानी कही जाती है ।।

ब्राह्मण वादी व्यवस्था (प्रज्ञावान) क्षत्रिय व्यवस्था (शक्तिवान) वणिक व्यापारिक व्यवस्था (धनवान) श्रमिक /शूद्रव्यवस्था(श्रमवान ) अश्रमिक /अशूद्र ( लूटपाट व्यवस्था ) नियंत्रण हीनता पर लिखना शेष है

—जैसे ब्राह्मणों का पूजा पाठ , समाज संचालन का , प्रशासन का अधिकार नियम जिससे वे निर्धनता और गरीबी के कुचक्र /दलदल से न निकल पाने से दलित जैसी दयनीय स्थिति में रहते हुए अभिशापित जीवन जीने को मजबूर हैं । इस पूजा पाठ प्रशासन के नियम के लिए बहुत ज्ञान ध्यान बुद्धि चातुर्य अध्ययन की आवश्यकता होती है लेकिन वे सत्य नारायण कथा को सर्वोपरि सर्वश्रेष्ठ मानते हुए वैदिक वैज्ञानिक ज्योतिष ज्ञान से दूर हैँ ।।

हमको/उन अपरिवर्तित समाज परिवार के लोगों को जिनकी सोच विचार आज भी पुरानी है जो आज भी अपने जीवन पद्धति को पुरानी रुढिवादी विचारधारा से से जीते हुए खुद ही अपने आप को सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक हानियाँ पहुंचा रहे हैं । ऐसे हमें भी अपने पुराने घातक /हानिकारक नीति नियम रीति-रिवाज को बदलकर नये लाभकारी नीति नियम रीत रिवाज अपनाकर अपने जीवन में नयापन लाते हुए अपने जीवन को नये तरीके से जीने में समझदारी है । पुराने नीति नियम रीति-रिवाज निर्माताओं को कोसना मनुस्मृति नियम रीति-रिवाज पर कमेंट करना हमारी बुद्धि हीनता दर्शाते हैँ । कि हम आज भी अपनी निजी जीवन पद्धति को हानिकारक होते हुए आज भी अपने जीवन को पुराने नीति नियम रीति-रिवाज से जीने को मजबूर हैं । जबकि तमाम धनाढ्य वर्गों के लोग जो विभिन्न धर्म समाज जातियों से संबद्ध हैं वे इसलिए अपने जीवन में आर्थिक सामाजिक राजनीतिक रूप से तरक्की कर गए कि उन्होंने अपने जीवन को नये परिप्रेक्ष्य नयी परिस्थितियों के अनुसार जीना सीख लिया ,,जैसे कुछ ब्राह्मण चिकित्सा, राजनीति ,विधि संकाय , अध्यापन ,और तरह तरह के नये उद्योग धंधों में उतर आए औँर फिर से धनी संपन्न हो गए ।

जबकि हमने अपना मानसिक बौद्धिक विकास नहीं किया है पुराने ज्ञान को ज्ञान पद्धति को कोसने उसमें कमी निकालने में ,पुराने समाज नियमों से शिकायत करने में लगे हुए हैं।। जबकि मनुस्मृति को पूरा पूरी तरह पढ़ने पर ज्ञात होता है कि उसमें भी ऋषि-मुनियों ने समाज व्यवस्था की आवश्यकता के अनुसार समय समय पर नीति ( नियम ) रीति-रिवाज में परिवर्तन किए हैं ।इसका पता तब चलता है जब एक श्लोक का अर्थ दूसरे श्लोक के अर्थ /मनत्व्य को क्लेशित करता है ।।

विकास नियम :- रीति-रिवाज के अनुसार जीवन को नये परिवेश से जीना समझदारी है ना कि नये परिवेश में पुराने नीति नियम रीति-रिवाज को अपनाकर अपने जीवन को कठिन दुखदाई परिस्थिति में जीना मुश्किल से जीया जाय ।या पुराने हानिकारक घातक प्रदूषित सामाजिक नियमों का निरंतर पोस्टमार्टम करते रहने में अपना समय खराब/बरबाद किया जाय ।। लेकिन जीवन को फिर भी जिया जाता है जब एक नहीं अनेकों घातक बरबादी दायक प्रतिकूल नियम परिस्थितियाँ समाज परिवार में व्याप्त होती हैं ।। कोई भी जीव समाज से समाज के घातक हानिकारक नियमों से विचलित होकर जीवन का त्याग नहीं किया करता सभी जीवों को अपने जीवन में समाज में रहना है तो समाज के नियम प्रतिकूल हो या अनुकूल हो ऐसी स्थिति में जीवन को जीने के लिए समाज के प्रतिकूल नियमों के साथ सामंजस्य दिखाते हुए जीना पड़ता है।

अब आते हैं आपके जीवन शंका सर्ग :- समाज में प्रगति के पदक्रमिक व्यवस्था नियंत्रण जिसमें मनुष्य अपनी बुद्धि बल धन के कारण बल से तरक्की करता हुआ समाज के पाचों सम्मानित पदों पर जा सकता है या एक पदीय स्थिति में आजीवन रुका रहता है बल बुद्धि धन की कमी के कारण रुप से ,, पर समाज में नियमों की स्थिति स्थिरता में समय- समय के अनुसार धर्म संस्कृति विधान के अनुसार क्षेत्र के अनुसार बदलती रहती है ।परिवर्तन होता रहता है ।इन समाज के नियमों में परिवर्तन समाज को नियंत्रण करने वाले पंच परमेश्वर मालक पांच पुरुष स्तर है । जिनमें है सबसे निम्न स्तर के (1) साधारण पुरुष:: निर्माण विनाश कर्ता समाज के सभी अच्छे बुरे नियमों को शिरोधार्य करते हैं जैसे माना कि सभी नियम इन्हीं के लिए बनाए गए हैं , परंतु साधारण पुरुष से ऊपर के 4 पुरुष स्तर इन नियमों के साथ कहीं पर सामंजस्य बिठाते हैं तो कहीं पर इन नियमों का विरोध करते हैं और कहीं पर इन नियमों को नहीं मानते जैसे (2)* विप्र या विशेष पुरुष जिन्हे ब्राह्मण कहते हैं ये सामाजिक प्रशासक निर्माण विनाश को अपने बुद्धि चातुर्य से नियंत्रित रखते हैं ।परंतु यह ब्राह्मण भी नियमों के नीचे रहते हुए अपना जीवन सुख शंका दुख की स्थिति में जीते हैं । ब्राह्मणों से ऊपर नियम बनाने वाले (3) ** विधि पुरुष या न्याय पुरुष होते हैं जो नियमों की समय अनुसार विवेचना करते हैं इन्हें विधायक पुरुष कहते हैं यह विधायक पुरुष भी नियम बनाने को स्वतंत्र नहीं है ।इन विधायक पुरुषों के ऊपर (4)*** मनु पुरुष होते हैं जो समाज के आवश्यकता के अनुसार नए नियम बनाते रहते हैं और पुराने नियम हटाते रहते हैं यह सामाजिक नियमों से ऊपर होते हैं ।अर्थात यह समाज को नियम बनाते हैं लेकिन जरूरी नहीं कि समाज के नियमों को अपने ऊपर जस का तस लागू रखें यह अपने ऊपर लगे नियमों में अपनी इच्छा अनुसार माने ना माने या नियमों में परिवर्तन करने करने को स्वतंत्र हैं इन मनु पुरुषों के ऊपर (5) ****देव पुरुष इंद्र गण होते हैं जो अपने जीने के लिए अपने हिसाब से नियम बनाते और मानते हैं लेकिन समाज के सभी लोगों को मनु पुरुषों के द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार जीवन जीने के लिए बाध्य करते हैं और समाज के सभी लोगों को नियंत्रित रखते हैं । समाज के सभी नियमों में परिवर्तन करने या बदलाव करने का अधिकार केवल मनु पुरुष सांसद गंण को होता है बाकी इंद्र पुरुष और ***** युगपुरुष इन समाज के नियमों से परे और ऊपर रहते हुए अपना जीवन अपने विशेष नियमों में जीते हैं।*मनुष्य के रुतबे सम्मान को व्यक्त करने के लिए है ।

समाज के संवैधानिक नियमों के 4 चरण आधार गुण होते हैं जिन के जिनके आधार पर समाज में शांति व्यवस्था और अशांति व्यवस्था दोनों मिश्रित रूप से चलती रहती हैं यदि शांति व्यवस्था अधिक है और अशांति व्यवस्था न्यून है तो उसे सतयुग कहते हैं यदि शांति व्यवस्था अधिक है और अशांति व्यवस्था कम है तो उसे द्वापर युग कहते हैं । जैसे-जैसे अशांति का अनुपात बढ़ता जाता है युग परिवर्तन के अनुसार त्रेतायुग और कलयुग कहे जाते हैं ।।

इसमें विशेष रुप से चार शब्द नीति रीति (प्रीति) कुरीति और अनीति मुख्य हैं । सतयुग में नीतियां प्रधान होती हैं सबके लिए नियम सामान एक जैसे होते हैं राजा रंक का भेद नहीं होता जैसे जनक राज ।। द्वापर युग में रीति-प्रीति प्रधान होते हैं जिससे कुल और वंश के लोग शासन की नीतियों का अधिक लाभ उठाते हैं और प्रजा निम्न स्तर पर रहते हुए जीवन जीती है जैसे दशरथ राज ।। , त्रेता में लोग कुरीति प्रधान होते हैं समाज के लोग राजा के कठोर नियमों से पीड़ित होते हुए समाज के मनु नियमों के कठोर नियमों से पीड़ित होते हुए अपना जीवन दुख शंका संशय में जीते हैं जैसे किष्किंधा राज बाली का शासन वानर जाति ।। अब अनीति का शासन मैं लोग अपने बुद्धि बल की श्रेष्ठता के अनुसार अपना जीवन जीते हैं छोटे बड़े ऊंच-नीच का भेद चरम उत्कर्ष स्तर पर होता है समाज के निम्न वर्ग के लोगों के पास जीवन अधिकार तक राजा के द्वारा नियंत्रित होते हैं परंतु राजा और राजकुल स्वेच्छाचारी होता है जो निम्न वर्गीय लोगों को नौकर गुलाम दास बना कर लगता है उनका जीवन और जीवन स्तर का मानक मूल्य होता है ।ऐसे लोगों का मुंह अपराध पीड़ित होने पर मानक मूल्य धन देकर बंद कर दिया जाता है।इन लोगों की इच्छा भावनाएं मानक मूल्य निर्धारित होती हैं ।ये लोग सामाजिक , राजनीतिक ,आर्थिक ,वैज्ञानिक सोच हीन , अधिकार हीन पशुओं के समान अपने जीवन को मानव होते हुए भी पशुओं के समान बिना निजी मौलिक सोच के अधिकार हीन होकर जीते हैं । ऐसे निम्न वर्गीय लोगों के जैविक मौलिक अधिकार तक स्वतंत्र नहीं होते बस राजा की मर्जी चलती है कोई प्रजा जन रीति नीति अनीति कुरीति की विवेचना नहीं कर सकता । सभी राजा शासक लोगों के द्वारा बने कठोर नियमों में अपना जीवन जीते हैं यह अनीतिका शासन होता है ।।

इसे रावण राज ( सबको रुलाने वाला ) या दुर्योधन राज (बुरे असामाजिक कर्मों को वैध/सही ठहराना ) कह सकते हैं ।जिसमें सीता अपहरण और द्रोपदी चीरहरण जैसी असामाजिक अपराधीक घटनाओं का प्रायोजन करनेवाले नीति स्थानक राजपरिवारों के लोग थे ।इस अनिति शासन या राजवंश का उन्मूलन या समापन जिस भी व्यक्ति विशेष के द्वारा किया जाता है उसे युगपुरुष इंद्र पुरुष या ईश्वर और ईश्वर का अंश राम ,कृष्ण आदि अवतार कहा जाता है यह प्रकृति द्वारा विशेष मानव पुरुष संरक्षित होता है जिस पर प्रकृति नियंता ईश्वर की विशेष दृष्टि होती है।

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