ध्यान या मेडिटेशन की शुरुआत करने के लिए कोई अलग से तरीका ऐसा नहीं है जो समझ में ना आए । मैंने ध्यान या मेडिटेशन की शुरुआत महर्षि महेश योगी की आश्रम में नोएडा भावातीत ध्यान विधि के द्वारा शुरू की थी । इसके अलावा जीवन विज्ञान अकादमी द्वारा जैन मुनि सुशील कुमार जी के निर्देशन में प्रेक्षा ध्यान भी सीखा था । आज के जमाने में ध्यान की अनेक विधियां अनेक लोगों के द्वारा प्रचारित की जा रही है जिनमें रजनीश का संभोग ध्यान सबसे ऊपर है । इस ध्यान से कौन सिद्ध बना यह अभी शेष है । मैं इस संभोग ध्यान का समर्थन नहीं करता । लेकिन इसके अलावा विपश्यना ध्यान की विधि जैसे अनेकों प्रकार के ध्यान जिनके मैंने नाम सुने हैं ।
लेकिन मुझे जो सर्च अच्छा लगा वह ज्ञान से ध्यान या ज्ञान योग सबसे अच्छा लगा । इसका मतलब है यदि सुनने वाले मनुष्य कि ध्यान को /चित्त को/मन को उद्रगिन ने वाली समस्या जिसने उस मनुष्य के दिमाग के /मन के सेंटर को ना सुलझ पाने के कारण उसके दिमाग को खराब कर दिया है दिमाग बेचैन कर दिया है ऐसे में उस मनुष्य की भाषा में सही सरल आसान शब्दों में जो उसकी समस्या है उसका सही निराकरण उसे बताया जाए और उस मनुष्य के दिमाग में अपनी समस्या के हल का निदान अपनी भाषा में समझ में आ जाए तब थोड़ी देर बाद उस मनुष्य के दिमाग को शांति आती है । जो मानसिक शांति उस समय मन में आती है मनुष्य का दिमाग थोड़ी देर के लिए शांत विश्राम की मुद्रा में आ जाता है । वही मानसिक शांति संभोग के रजनीश के ध्यान विधान से मिलती है , वही मानसिक शांति भावातीत ध्यान से मिलती है जब मन में दबी अनेकों असंख्य असंभव समस्याएँ असंतोष के समिश्रण से पुरानी मन को तनाव देने वाली अनेक समस्याएं अनेक घटनाएं जो मन में पड़ी रहती हैं जिनका मन को हल नहीं आता वही समस्याएं जब मन को शांत छोड़ दिया जाता है । तो वही मन को तनाव देने वाली समस्याएं अवचेतन मन के द्वारा तरह-तरह के उपक्रम दिवास्वप्न के द्वारा अक्सर ध्यान संध्या के समय निकलती हैं जिससे मन को शांति मिलती है । , वही मानसिक शांति विपश्यना ध्यान ध्यान द्वारा मन में छिपी पुरानी समस्या या लाभ हानिकारक दायक घटना या बात को मनके द्वारा पकड़ लेने पर , वह पुरानी तनाव उत्पन्न करने वाली समस्या या बात जब अवचेतन मन से अनेक रूपों में बाहर आती है । तब लोगों के मन को विपश्चितः विपश्यना / मन में छिपी बात /समस्या को मन के द्वारा पकड़ने की योग्यता विधि सीख लेने पर चित्त के शांत हो जाने से लोगों में आती है । सोहम ध्यान साधना में मनुष्य के मन को यह सिखाया समझाया जाता है ।कि समस्त सांसारिक आधिव्याधि समस्याएं मन के विकार हैं मन के स्वामी प्राण के विकार नहीं । प्राण प्रतिष्ठा निवास प्राण संयंत्र नाक श्वास नली फेफड़ों में है । अतः मनुष्य को समस्त सांसारिक दृश्य जगत की अवहेलना करते हुए अपना ध्यान केवल अपने श्वास संयंत्र नाक श्वास नली फेफड़ों में गति में केंद्रित करना सिखाया जाता है। जिससे मनुष्य उस क्षणिक समय में संसार से मिले सांसारिक कलेश्वर को भूल कर अपने निजी श्वास गति की गिनती करने में ,श्वास प्रेक्षण प्रेक्षागृह में खो जाता है ।लेकिन जैसे ही यह स्वसन विश्वशम से स्वास हटता है ध्यान हटता है और मनुष्य संसार में जगत में आता है तो उसके मन को वही पुरानी बातें वही पुरानी समस्याएं उसके चित्र को उद्दीन करने लगती हैं। क्षणिक शांतिपूर्ण चित्त अवस्था को को सोहम ध्यान कहते हैं ।
परंतु ध्यान योग , कथा सत्संग ,उत्तम वार्ता से , जो मन को दीर्घकाल तक शांति मिलती है उसमें मन दीर्घ काल तक शांत हो जाता है उसे महर्षि वशिष्ठ में ध्यान समाधि कहा है जो अक्सर अपने प्रियजन के मिलने पर भी लग जाती है । जिसमें मन शांत चित्त पुलकित होता है । जैसे माता पुत्र के मिलन पर माता की पुत्र की प्रेम से ज्ञान भाव समाधि , उत्तम चित् वाले पति पत्नी के मिलन पर प्रेम भाव समाधि , या पिता पुत्र मिलन पर पुत्र की अभयभाव समाधि , गुरु शिष्य के मिलन पर अक्षर ज्ञान समाधि लग जाती है । जिसमें लम्बे समय तक उनके मन में कोई बात नहीं आती , वह सब भूल जाते हैं । मन अपने कार्य चिंता चिंतन मनन स्मरण स्मृति आदि बंद कर देता है । जैसे कृष्ण के पहुंचने पर विदुर पत्नी के मन में कृष्ण सानिध्य से प्रेम समाधि भाव उत्पन्न हो गया था । महाभारत युद्ध से पहले जब कृष्ण विदुर के घर गए तो कृष्ण ने बच्चे की तरह सेगृहप्रवेश से पहले द्वार पर से कहा काकी भूख लगी है । विदुर पत्नी अपने घर पर नहा रही थी कृष्ण के आने की खबर सुनते ही वह बिना कपड़े पहने कृष्ण को भोजन कराने के लिए दौड़ पड़ीं सामने केले के फल दिखाई दिये वह कृष्ण की भूख के वेग को समझते हुए कृष्ण को नग्न अवस्था में केले खिलाने लगीं प्रबल कर्म भाव के वश वह सामाजिक मान मर्यादा एं भूल गयीं । और कृष्ण भूल गए थे कि विदुर पत्नी बिना कपड़ों में हैं । विदुर पत्नी को ध्यान नहीं रहा कि वह कपड़े नहीं पहने हैं वह मातृ प्रेम भाव से कृष्ण को भोजन कराने में खो गई थी उसे वस्त्र पहनने की विदुर के आने पर अनुभूति हुई जब विदुर ने उसे बताया कि वह बिना वस्त्रों के कृष्ण को भोजन करा रही है । तब कृष्ण ने कहा था चाचा विदुर अब केलो में वह स्वाद नहीं रहा काकी का मातृ भाव खो गया । ऐसी ही विचित्र प्रेमभाव समाधि सबरी को लगी थी जब वह अपने इष्टदेव राम को अपने झूठे बेर चख चख कर खिला रही थी और राम खा रहे थे तब राम को उनके भाई लक्ष्मण ने चेताया था । प्रभु आप कहां हैं अब झूँठा खा रहे हैं । तब श्री राम ने लक्ष्मण को समझाया था । लक्ष्मण सबरी को प्रेमभाव समाधि उत्पन्न हो गई है । मैं नहीं चाहता कि सबरी की प्रेमभाव समाधि समाप्त हो । इसकी प्रेमभाव समाधि के मान को रखने के लिए मैं इसके झूठे भी खा रहा था।
इसी प्रकार से अक्षर ज्ञान समाधि गुरु शिष्य के मिलन पर शिष्य को उत्पन्न हो जाती है जिसमें शिष्य अपने प्रिय गुरु दर्शन करने के पश्चात पढ़ना लिखना कार्य करना सभी भूल जाता है और शिलक शिष्य शिला / पत्थर के समान जड़वत् बना रहता है तब उसे गुरु चेताया करते हैं ऐसी अक्षर ज्ञान समाधि किसी श्रेष्ठ प्रिय से सतत वार्ता के द्वारा अक्सर मिलती है । अक्षर ज्ञान ध्यान समाधि , मातृ प्रेम भाव समाधि , पति पत्नी की प्रेमभाव समाधि के समय में जो लोग अपने मन को श्रेष्ठ संकल्प देते हैं तो उनका मन और ब्रह्मांड मिलकर कार्य करने लगते हैं मनका ब्रह्मांड नियंता से संपर्क बन जाता है और उस समाधि की अवस्था में दिए गए संकल्प कथन श्रेष्ठ परिणाम देने लगते हैं जिसे कहा जाता है अरे इसकी तो मुंह बका फलती है इसका मतलब जिसकी मुंह बका फलती है वह व्यक्ति कथन वार्ता के समय समाधि में उस समय होता है । यदि हम चिंता चिंतन मुक्त समाधि अवस्था मेंअपने मन के अवचेतन स्तर को श्रेष्ठ संकल्प श्रेष्ठ कथन देने लगते हैं तो इसके द्वारा हम अपने मन की ब्रेन सेटिंग खुद कर लेते या अपने मन की सेटिंग खुद करने में सीख जाते हैं । अक्सर होता यह है कि दिमाग हमारा मन हमारा लेकिन ज्ञान दूसरों का तब परिणाम खराब खतरनाक आता है । गुरु जी को भी समस्या और शिष्यों को भी समस्या , घर वालों को भी समस्या ,, तो मैं तो ध्यान का खराब होना ह जब ध्यान खराब है तो ज्ञान अपने आप खराब हो जाएगा । इसे कहूंगा कि मेरे हिसाब से ध्यान का अर्थ ब्रेन सेटिंग अपना दिमाग अपना मन की सैटिंग आप करना है ।जो अपना मन दूसरों की गलत बातों से खराब हो जाता है घायल हो जाता है । तो जब हम ध्यान करते हैं तो ध्यान के द्वारा हम अपने मन को अपनी बातों से अपने सुझावों से समझा कर शांत करते हैं। ध्यान की इसी महिमा को को ध्यान में रखते हुए सभी धर्म मातलंबीओं ने सभी धर्म समाज संस्कृतियों में अपने ध्यान को अपने अपने तरीके से अलग-अलग सभी के लिए अनिवार्य बताया है। किसी ने इसे नमाज कहा है। किसी ने इसे पूजा-पाठ कहा है। किसी ने इससे अलख निरंजन कहा है ।यह शब्दों का फेर है लेकिन मूल कार्य है अपने मन की सेटिंग अपने ज्ञान विवेक से करना सही ध्यान है ।
ध्यान मनुष्य के मन की अति सक्रिय परम ऊर्जा माय अवस्था होती है जिसमें मनुष्य के विचार उसकी इच्छा भावना के अनुसार क्रमबद्ध रूप से लगातार देर तक आती रहती हैं विचारों के लगातार आते रहने को धारणा कहा जाता है धारणा के पश्चात विचार लगातार आते रहने से जब मस्तिष्क थक जाता है मस्तिष्क में ऊर्जा की कमी पड़ जाती है तो ऐसे में मस्तिष्क विश्राम अवस्था विचार हीन विचार शून्य अवस्था समाधि अवस्था में चला जाता है जो लोग ध्यान के बारे में तरह-तरह की बातें बताते हैं वह ध्यान की अवस्था के लक्षण बताते हैं ध्यान की क्रियाविधि के दौरान विचार नियंत्रण की विधि पर ध्यान नहीं देते किसी भी मनुष्य का बुद्धिमान होना उसके मस्तिष्क का निरंतर क्रमबद्ध रूप से एक समान सकारात्मक विचार या एक समान नकारात्मक विचार श्रंखला का लंबे समय तक चलते रहना है मूर्ख मनुष्य में विचार श्रंखला का समय अति सूक्ष्म या छोटा होता है जिससे मनुष्य अपने ध्यान को लगातार इसी शब्द वार्ता चित्र दृश्य पर लंबे समय तक नियंत्रित नहीं कर पाते हैं।
बिना सुयोग्य गुरु के निर्देशन में ध्यान साधना करना खतरनाक साबित हो सकता है। यह मैंने दूसरे सबाल के जबाब में निजी अनुभव में लिखा है । क्या ध्यान साधना करने में कोई खतरा या दुष्प्रभाव ह? अपने आप किताब में से पढ़कर करने पर या बिना गुरु के दूसरे लोगों से सुनकर अपने आप किया जाता है तो;
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