समाज समाज में आदिकाल से चार प्रकार के नियंत्रण व्यवस्थाएं पाई जाती हैं नंबर 1 ब्राह्मणवादी व्यवस्था यह विचार प्रधान ज्ञान पर आश्रित होती है जिसमें सभी लोग एक दूसरे को समझते हुए व्यवहार करते हैं नंबर 2 छत्रप व्यवस्था यह शक्ति प्रधान व्यवस्था है जिसमें बलवान लोग निर्बल लोगों को भय बनाते हुए उनसे मारकाट करते हुए उन पर नियंत्रण बनाकर रहते हैं नंबर 3 धन आश्रित व्यापारी व्यवस्था यह धन पर आश्रित होने से व्यापार या धन यंत्र व्यवस्था कहीं गई है जिसका आधार वित्त अर्थात खाद्य पदार्थ और उपयोगी पदार्थों का आपस में मानक विनिमय कारण वित्त के द्वारा समाज नियंत्रित किया जाता है/रहता है नंबर 4 पर श्रमिक व्यवस्था यह है चतुर्थ वर्ग की निर्माण प्रधान व्यवस्था है जो कृत्या कर्म कृति वस्तु निर्माण/विनाश पर आश्रित है ।इस व्यवस्था में प्राय संवैधानिक व्यवस्था हिल जाता है ।जबकि व्यापार या वित्त नियंत्रण व्यवस्था में संविधान व्यवस्था धन से संचालित होती है ।
सरकारी करण या राष्ट्रीयकरण में धन का वितरण पब्लिक के पास अधिक होता है , शासक वर्ग के पास सीमित या कम धन चालती हुईं स्थति में होता है ।इंदिरा गांधी ने सरकारीकरण /राष्ट्रीयकरण मंत्र दिया था । जिससे समस्त धन का समान वितरण करने के लिए बैंकों का राष्ट्रीय करण करने का प्रयास किया गया था । गरीबों निर्धनों को भूस्वामी बनाने के लिए भूमि वितरण के लिए सीलिंग एक्ट बनाया था , जिसके अनुसार कोई भी मनुष्य 100 बीघा से ज्यादा जमीन अपने नाम पर एक नाम पर नहीं रख सकता था जिसके पास 100 बीघा से ज्यादा जमीन थी वह सभी सरकार ने बिना कोई धन दिए अपने पास अधिग्रहण कर ली थी और उस भूमि के वितरण का अधिकार ग्राम सभा को या नगरपालिका को दिया गया था जो कि लोकतांत्रिक सरकारी संगठन होते हैं। जिससे आज भी गांव में सभी लोगों के पास आवासीय जमीन होती है । जिसमें वह अपने लिए अपनी सुविधा अनुसार मकान बना सकें या लघु उद्योग व्यवसाय घर पर रहकर कर सकें। प्रिवियस पर्स एक्ट ( आदमी कत्ल पर सजा नहीं / खून माँफ ) खात्मा/उन्मूलन करना ।( शासक वर्ग के विशेष सुरक्षा अधिकार ) जिनके अंतर्गत वो अपने विरोध करने वालों को दोषी हैं या निर्दोष उनको अपनी इच्छा शर्तों पर जीवन जीने दें ।अधिक अप्रिय घटना स्थिति में वे अपने विरोधियों को जब चाहें जहाँ चाहें उनको अपनी इच्छानुसार कत्ल /खत्म करके शासन /शासक विरोध के अपराध आरोपी बनाकर जब चाहे जहाँ चाहे मृत्यु दंड देकर /कत्ल करके अपनी संतति का जीवन निर्भय निष्कंटक कर सकें ।
ऐसी विचित्र आदम कालीन शासन व्यवस्था बहुत पुरानी है । इसमें अधिकांश सभी शासक सतावर के लोग आदिकाल से ऐसा कृत्य करते रहे थे परंतु इस दुष्ट कृत्य को पहली बार रूस में कार्ल मार्क्स दार्शनिक ने जार शासक के विरुद्ध रक्त क्रांति करा कर शासकों के इस आधिकारिक अपराध को प्रथा को खत्म करके नई लोकतांत्रिक जनता की सरकार की नींव रखी थी जिसका दौर शुरू हो चुका था परंतु वर्तमान में यह व्यवस्था वंशवाद के नये अवतार में अपनी पुराने रूप में फिर लौटती दिखाई दे रही है । जो वर्तमान में दुनिया के अधिकांश सभी देशों के लिए जनता वर्ग लिए खतरा बनती दिखाई दे रही है अर्थात पुरानी क्रूर दुष्ट शासन व्यवस्था निजी करण की आड़ में फिर से शुरू होती दिखाई दे रही ह।
जबकि निजी करण में धन का वितरण शासक वर्ग के पास या शासक वर्ग द्वारा संरक्षित धनाढ्य वर्ग / कारपोरेट घरानों के पास अधिक होता है ।जनता /पब्लिक में धन का वितरण निजीकरण के चलते कम से कम तर होता चला जाता है । पब्लिक लगातार निर्धन होती जाती है। पब्लिक का हर प्रकार का शोषण श्रम शोषण , ज्ञान शोषण /चूषण , यौन शोषण और भी तरह-तरह के जितने सभी प्रकार के शोषण हैं । वह सभी प्रकार के शोषण धनाढ्य वर्ग द्वारा और शासक नियंत्रित कर्मचारी वर्ग के द्वारा विभिन्न रूपों में किए जाते हैं । निजीकरण में मानव मूल्यों का अवमूल्यन निरंतर जारी होते रहने से मानव का श्रम मूल्य ( बौद्धिक /शारिरिक श्रम मूल्य ) कम से भी कम होता जाता है। जनता का मूल्य और पशु का मूल्य लगभग बराबर जैसा होता है ।जिस प्रकार से किसान पशु को केवल चारा और सुरक्षा का लालच देकर उसका सभी प्रकार से शोषण करता है गाय को जीवन जीने के लिए दूध मांस देना पड़ता है अपना जीवन मनुष्य के हित में त्यागना पड़ता है मुर्गी को अपना जीवन जीने के लिए मनुष्य को अपनी संतान का वध करवाना पड़ता है अंडा देकर जबकि बुद्धिमान कुत्ता ना दूध देता है न माँँस देता है ना अंडे देता है और मानव समाज में सर्वप्रिय बना रहता है क्योंकि कुत्ते ने बुद्धिमान लोगों को बलवान लोगों को खुश रखने खुश करने का चापलूसी करने का जीवन मंत्र समझ लिया है।
ठीक उसी प्रकार से निजी करण में सरकार और सरकार संरक्षित धनाढ्य वर्ग / कारपोरेट वर्ग और ठेकेदार ठेकेदार /जमींदार संगठन वर्ग के लोग सबसे निचले स्तर के मनुष्य को सिर्फ अधिकतम लालच देकर मनुष्य की संतान को बौद्धिक रूप से शारीरिक रूप से गुलाम बना लिया करते हैं जिससे उन मनुष्य मानवो गुलामों की औलाद अपनी बुद्धि अपने श्रम का उपयोग उन निकम्मे निठल्ले शासक वर्ग के धनाढ्य वर्ग के लोगों के हित में करती है। यह शासक वर्ग के लोग और इन शासक वर्ग के द्वारा संरक्षित धनाढ्य वर्ग के लोग श्रमिकों का सभी प्रकार का शोषण केवल नौकरी की अनुकंपा देकर करते हैं । नौकरी में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है की समस्त अधीनस्थ श्रमिक कोई इतना धन दिया जाए जिससे वह बस अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर सकें। किसी भी हालत में श्रमिक का इतना ज्यादा विकास ना हो जाए कि वह शासक वर्ग को चुनौती देने लगे । इस बात का निजी करण में विशेष ध्यान रखते हुए तृतीय और चतुर्थ ग्रुप के श्रमिकों को कर्मचारियों को जीने लायक कम से कम न्यूनतम वेतन पर नियुक्त किया जाता है और आजीवन प्रयास यही किया जाता है की वह न्यूनतम वेतन के अंतर्गत अपना जीवन व्यतीत करें भौतिक सुख समृद्धि से दूर रहें। रावण शासन पद्धति के अनुसार ।
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