जिंदगी में सफलता प्राप्त करने का एक भी मंत्र नहीं है यदि कोई सफलता हासिल करना चाहता है तो उसका सिर्फ और एक सिर्फ शब्द है जिसका नाम है सच्चाई । ज्यादातर लोग सफलता हासिल करने के लिए कठोर परिश्रम, अनुशासन, दूरदृष्टी ,पक्का इरादा, लगन आदि असंख्य अनेक शब्दों में व्यक्त किया करते हैं । लेकिन ये सभी क्वालिटी /विशेष गुण गधा , चींटी , गिद्ध , सिंह , भेड़िया /कुत्तों में भी होते हैं फिर वे पशु क्यों कर रहे गये ?ये सभी या एक इनमें से श्रेष्ठ पशु होकर भी आदमी से आगे सम्मानित क्यों नहीं बन पाए ? विकास की दौड़ में आदमी से पिछड़ गए । सफलता उन लोगों को मिलती है जिनकी सोच ईश्वर समान होती है जो निर्माण अधिक विनाश कम बुद्धि वाले सामाजिक व्यावसायिक सोच विचार इच्छा वाले होते हैं । जिनका स्वभाव ज्यादा से ज्यादा जीवों पशु पक्षी मनुष्य आदि की मदद करने वाला होता है ।
जीवन में कामयाबी/सफलता अपने मन के अवचेतन स्तर में डली सत्य सूचना, निजी आत्मविश्वास, वैधानिकता नीति आश्रित सूचना ,पर आधारित मशीनी मेहनत, परोपकार भाव पर बनी आदत जीवन पद्धति पर निर्भर करती है । जो लोग निरंतर अपने हित की सोच विचार इच्छा रखते हैं अपने लिए खुद सच्चाई पर ईमानदारी पर नहीं होते स्वभाव सोच आदत से कृष्ण /कंजूस होते हैं मेहनत करने की जिनकी आदत नहीं होती स्वभाव से भीरु /डर्रु /फट्टू होते हैं , अपने जीवन में कभी सफलता हासिल नहीं कर सकते हैं ।
कितना कठिन है एक फेल हुए बच्चे को /छात्र को अहसास करा पाना कि तुम फेल हो गए हो परीक्षा में । और कितना आसान है एक नकारा नाकाबिल अयोग्य छात्र को नकल से , सोर्स सिफारिश से , , डोनेशन देने पर पास होने पर अहसास कराना कि तुम पास हो गये हो । जबकि वह व्यक्तिगत रूप से जानता है कि उसने पढ़ाई में मेहनत नहीं की है , या उसका पेपर /परीक्षा प्रश्नपत्र ठीक से नहीं हुआ था ।अब जब अनैतिक रूप से वह पास हो जाता है तो सहर्ष स्वीकार कर लिया करता है कि वह पास हो गया है । ऐसे छात्र/मनुष्य अपने आप से छल कपट करते हैं जो फेल होने पर अपने को फेल नहीं मानते/समझते और न ही अपनी श्रम/मेहनत में कमी को स्वीकार करते हैं ।वे सफल क्योंकर होंगे । क्योंकि ये अपने स्वयं प्रति भी ईमानदार/सच्चाई युक्त नहीं होते हैं ।
फेल होने पर रोबिन शर्मा ने कहा है कि फेल होना एक बाधा है शैक्षिक विकास मार्ग में , जो यह सिद्ध करती है कि 1:आपने अपने लिए अध्ययन विषयों का चुनाव अपने लिए अपने आप नहीं किया है अध्ययन विषयों का चुनाव आपने दूसरों की सलाह पर माता पिता गुरु मित्रों की सलाह पर किया है ।जिसमें आपकी रुचि, सहमति नहीं है । जब चुनाव/चयन गलत हुआ है । तो परिणाम भी गलत ही आयेगा ,फिर दुख क्यों हो रहा है । लगातार मेहनत करने पर भी आप दो बार से ज्यादा बार बार फेल हो रहे हैं तो आपने अपनी अभिरुचि से हटकर, अपनी मानसिक बौद्धिक क्षमता दक्षता से हटकर गलत मार्ग चुनाव किया है ।दो बार से ज्यादा फेल होना औंर उसी अध्ययन मार्ग पर डटे रहना बज्रबुद्धि मूर्खता है ।ऐसी स्थिति में अध्ययन ट्रैक बदलना समझदारी है ।
2 : आपने अध्ययन के मानक स्तर से कम मेहनत की है या मेहनत नहीं की है अध्ययन विषयों की उपयोगिता महत्व को नहीं समझा है आप अध्ययन में रुचि नहीं ले रहे हैं । फिर फेल होने पर दुखी नहीं खुश होना चाहिये ।परिणाम वह आया है जो आप चाहते थे । लोगों को समाज को दिखाने के लिए /झूंठी सांत्वना लेने के लिए रुदन /रोना धोना क्यों?फेल होने पर मिले अपयश से बचने के लिए ; एक धोखा और अपने साथ जोड़ना ।
राबर्ट स्काटी के अनुसार जीवन में यदि कामयाब/सफल होना चाहते हैं तो पहले अपनी कमी अपने आप ढूंढें सोचें और फिर अपनी कमी में सुधार अपने आप करने की सोच विचार आदत डालें तब ही आप अपना सुधार अपने आप करके कामयाब/सफल हो सकते हैं । जब तक आप अपनी कमी के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराते रहोगे । दूसरे लोगों को समाज को दोष देते रहोगे , दूसरों में कमी ढूंढते रहोगे अपनी कामयाब बनने की तब तक उम्मीद मत करना कि तुम कामयाब/सफल भी हो सकते हो । जैसे फेल होने पर दोष अध्यापक को देना । जबकि फेल छात्रों के परीक्षा प्रश्नपत्र को रिकार्ड को बार बार ध्यान देकर ग़ौर से चैक किया जाता है ।
हम सभी की सफलता मेरे विचार से हमारे अपने जीवन में सच्चाई पर निर्भर करती है कि हम अपने जीवन में कितनी-कितनी सच्चाई /ईमानदारी/विश्वशनीयता /वैधता को अपने जीवन में स्थान देकर अपनी जिंदगी को जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक हो कर जी रहे हैं । अब जब सच्चाई की बात चली है तो आदमी समाज संस्कृति ने सच्चाई की बखिया उधेड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है । उसने सच्चाई की ,सच बोलने वाले की खूब मज्मत / धज्जियां उड़ाई हैं ॥ आज अब भी सच बोलना सच सुनना भयंकरतम अपराध माना/जाना जाता है मेरे विचार के अनुसार । आज अब भी सच बोलने पर अदालत में सजा निर्धारित की जाती है । जबकि जो भी व्यक्ति सच्चाई को महसूस कर लेता है उसके ऊपर मन में पड़ रहे त्रास की पीड़ा को तो वह समझ सकता है या फिर वह व्यक्ति जो सच्चाई स्वीकार करने पर पीड़ित हुआ हो , ऐसे अनेकों जज बाबाओं के किस्से सुनते हैं कि गलत फैसले हो गए तो अपनी आत्मा के दबाव से पीड़ित होकर उन्होंने सरकारी नौकरी लाभकारी पद का त्याग कर दिया ।
सच्चाई की सही परिभाषा कुरान में इस तरह से है सच बोलने की दो अवस्थाएं हैं निजी सत्य ( जो अपने लिए सत्य है तो यह जरूरी नहीं कि दूसरे दुनिया वाले लोग भी उसे सत्य मानें /समझें जैसे कि स्वप्न ) , दुनियावी सत्य ( दुनिया के समाज के लोगों से हम जो कुछ भी सुनते हैं या अक्षर ज्ञान से पढ़ते हैं यह कोई जरूरी नहीं है कि वह भी सत्य हो क्यों कि हम हर जगह एक साथ समान उपस्थित नहीं हो सकते और न ही प्रत्येक काल समय में हम मौजूद रहेंगे यह जरूरी नहीं है हमारी आयु निश्चित है ) दोनों तरह के सत्य -अलग अलग हैं ।। जबकि सत्य को वेदों में सिर्फ एक शब्द अर्द्धसत्य के नाम से परिभाषित किया गया है ।जो सच्चाई शब्द की वर्तमान स्थिति , निनाद (शब्द अनुभूति ) , उपलब्धि पर आधारित है । जिसके अनुसार आधा सच सदैव गुप्त /अदृश्य अज्ञात रहता है घटित और वाचन से पूर्व मैं ; और आधा सच भी वक्ता द्वारा व्यक्त तब होता है जब वह बोलता है या लिखता है चित्र साझा करता है ।। अपने अर्धांश के आंशिक सत्य ज्ञान के प्रतिशत अंश में भूमि पर सब जगह सभी जड़ चेतन वनस्पति पशु पक्षी मनुष्य आदि में व्याप्त है । जिसका समग्र /समय्क दर्शन करना , पूर्णतया अनुभव करना दिलो-दिमाग को भारी पड़ता है ।। जो लोग इस सतदर्शन ज्ञान कला विज्ञान को आंशिक रूप से समझना सीख जाते हैं वे समाज संस्कृति के शिखर पुरुष से युग पुरुष स्तर तक जाते हैं ।वे दार्शनिक कहे जाते हैं मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि सफलता/तरक्की वे लोग हासिल /प्राप्त करते हैं जो दार्शनिक बुद्धि होते हैं ।।
यह बात अलग है कि उनके जीवन में दार्शनिकता का अंश कितना है ? या वे अपने जीवन में कितनी दार्शनिकता अंश को अपनाते हुए अपनी जिंदगी जिम्मेदारी महसूस करते हुए जी रहे हैं ? क्या उनमें निजी जीवन में सच्चाई को महसूस करना आ गया ? !
लेकिन ज्यादातर लोगों को अपने लिए सच्चाई से बचना और दूसरे लोगों को सच्चाई पर चलने को प्रेरित करना ,सच बोलना चाहिए सिखाया जाता है कहा जाता है ।सच बोलना, सच्चाई पर चलने बोलने पर व्याख्यान देने वाले लोग अक्सर अपने जीवन में बहुत बड़े स्तर के झूंठे होते हैं । जो जुमला बाजी करते हुए ,सच पर लैक्चर देते हुए, दूसरे लोगों को सच बोलने को मजबूर करते हुए मिल जायेंगे । लेकिन वही लोग अपने जीवन में अपने लिए पूर्ण सत्य और दूसरे लोगों के लिए आंशिक सत्य / भ्रम सत्य / मित्थया सत्य /काल्पनिक सत्य का ज्ञान व्यवहार इस्तेमाल/प्रयोग किया करते हैं दूसरे लोगों को भ्रमित /झांसे में /झूंसी से रखते हुए अपने जीवन में कामयाब /तरक्की याप्ता होते हैं ।
सभी लोगअपने जीवन में अपने लिए सच्चाई को महसूस नहीं कर सकते हैं जैसे एक आंख का व्यक्ति अपने लिए काना या एक आंख का शब्द नहीं सुन सकता है । बिना कान का बूचा या बहरा नहीं सुन सकता है। बिना हाथ का लूला बिना पैर का अपाहिज नहीं सुन सकता है । इनको अंधा काना, बहरा बूचा,लूला अपाहिज शब्द सुनने में पीड़ा होती है । जबकि वास्तविकता यह है कि दोनों आंखों से समर्थ को कोई अंधा या काना नहीं कहेगा , उसे कहने के साथ ही दूसरे लोगों से अपने लिए अंधा या काना सुनना पड़ेगा ।। अनपढ़ और जाहिल गंवार अपराधी भी अपने लिए पुरुषोत्तम शब्द सुनना पसंद करते हैं । जब तक हम ऐसे कलियुगी लोगों को पुरुषोत्तम कहेंगे तब तक हम यह उम्मीद न करें कि ये अपने जीवन में पुरुषोत्तम बन सकेंगे । ये पुरुषोत्तम उस दिन बनना सोचेंगे , सीखेंगे , पुरुषोत्तम बनने की कोशिश जब करेंगे जब मर्यादा पुरुषोत्तम दशरथनंदन श्रीराम कथा रामचरितमानस से सुनकर इनमें अपने और श्रीराम के गुणों की तुलना करना आयेगा । ये अपनी मानवीय चरित्रिक कमी सत्यनिष्ठा , अशिक्षा/भ्रमशिक्षा , दुर्व्यवहार,व्यवहारहीनता को समझकर अपने चरित्र में अपने आप परिवर्तन करके अपने आप समाज में अपनी पहचान बनाने को तैयार होंगे । दूसरे लोगों से कहे गए सुने गए , रामचरितमानस में से पुरुषोत्तम बनना असंभव है । गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि वे बहुत विशेष बुद्धि मान कर्मठ नहीं थे एक दिन उन्होंने अपने घर के निकट सत्य प्रतीक राजा हरिश्चंद्र का नाटक देखा उससे प्रभावित होकर उन्होंने अपने लिए सत्य आश्रित हरिश्चंद्र बनने का संकल्प लिया और गांधी जी साधारण मनुष्य से विशेष युगपुरुष महात्मा गांधी बन गये । नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अपने पिता की सातवीं संतान थे , जो महाभारत के गुरु जन पात्र ज्ञानी विदुर , दानवीर कर्ण से प्रभावित होकर समाज के प्रति जागरूक होने से मानव समाज परिवर्तन को प्रेरित हुए थे।
अब मेरी कहानी संक्षेप में :- मैं स्वयं अपराधी कुल में उत्पन्न हुआ मैंने बचपन से आज अब तक अनीति कुरीति को अपने कुल में घटित फलित होते हुए देखा । जबकि मेरी मां एक कुलीन ब्राह्मण परिवार से थीं । उन्होंने मुझे कुलज्ञान अनीति कुरीति से हटकर सदैव नीति रीति-रिवाज की शिक्षा दी । मनुस्मृति, पंचतंत्र,मुल्ला नसरुद्दीन उर्फ नौराभैया के जीवन वृत्तांत/कहानियां सुना कर । मेरी मां का तकिया कलाम था :: झूंठ बोल दुबकता डोल सच बोल मन चाहे जहाँ डोल ;; सच्चे मन चरित्र वाले का दुश्मन सम्मान करते हैं ।। परिणाम यह हुआ कि मैं परिवार कुल से अलग सोच विचार करने वाला , अपना विकास - अपने आप कर गया उच्च शिक्षा प्राप्त करके । जबकि मेरे पिताजी की सोच दरिद्र नारायण की है :-अनीति कुरीति कथन करना ,हर समय नीति रीति रिवाज का उल्टा बोलना , सबकी तरक्की में बांधा पैदा करना न खुद आगे बढ़ना न दूसरों को आगे बढ़ने देना जो दूसरे लोग आगे बढ़ गये हैं तरक्की यापता हैं उनसे स्वयं बचना दूसरे लोगों को भी उनसे दूर रहने की सलाह देना । जैसे ::::सरकारी नौकरी उन लोगों की लगती है जिनके परिवार कुल वंश के लोग सरकारी नौकरी में पहले से मौजूद हैं वे अपनों को लगा लेते हैं या फिर सरकारी नौकरी उन लोगों की लगती है जिनके पास नेताओं को अफसरों को देने को मोटी रकम रिश्वत देने को है । मेरे पास इतना पैसा नहीं कि तेरी रिश्वत देकर सरकारी नौकरी लगवा दूं ॥ जबकि मेरा सच्चाई ईमानदारी मेहनत पर अकाट्य विश्वास है । परिणाम यह है कि मैं अपनी ऊंची सोच सच्चाई के बल प्रभाव पर उच्च शिक्षा प्राप्त कर के शिक्षानिदेशालय दिल्ली प्रशासन नियंत्रित राजकीय विद्यालय में २९वर्ष पहले शिक्षक नियुक्त हुआ और वर्तमान में प्रवक्ता पद पर हूं ।ना मेरे पास अब से २९वर्ष पूर्व नेताओं अफसरों को देने को रिश्वत थी न मेरे नेताओं अफसरों से जानकारी संबंध थे । लेकिन मेरा अपनी सच्चाई पर मेहनत पर अकाट्य विश्वास था । इतना ही नहीं मेरे दो भतीजे भी मुलायम सिंह यादव पुत्र अखिलेश यादव नियंत्रित सरकार में उ०प्र०पुलिस में निरीक्षक पद पर नियुक्त हुए थे। उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी ।उनके पास भी नौकरी के लिए रिश्वत देने को पैसे/रुपये नहीं थे । लेकिन अब एक आदर्शवाद पर रुका हुआ है दूसरा व्यवहारिक होकर बदल गया है ।
अंततः मैं यही कहूंगा कि पहले अपने लिए आप सच्चे बनो फिर सच्चाई ईमानदारी के मार्ग पर आओ मेहनत निरंतर करने की आदत डालो । कारण कि सरकार को समाज को मशीनी आदमी चाहिए मजदूर आदमी नहीं , जिनकी कार्य क्षमता दक्षता औरों से हटकर अलग हो । अक्सर लोग अपनी बौद्धिक क्षमता दक्षता शारीरिक मानसिक क्षमता दक्षता का आंकलन मूल्यांकन दूसरे लोगों से कराते हुए अपने भविष्य भाग्य का निर्धारण किया करते हैं । माता पिता गुरु ज्योतिष व्यावसायिक सलाहकारों के वाक्य कथन से यह मनुष्य की जड़मूर्खता उसे अपना उचित समय्क विकास करने से रोकती है। उसके विकास को बाधित करती है ।अपना अधिकतम विकास अपनी रुचि, अभिरुचि ,अपना स्व ऊर्जा मूल्यांकन स्टैमिना , अपने शौक पर आधारित होती है ।बस जरूरत है अपने बारे में सच सुनकर उसे सहन करके अपना स्वयं सुधार करने की । बात फिर अन्त में सच्चाई शब्द पर आकर रूकती है ।